पटना। शराबबंदी को सामाजिक क्रांति बताकर लागू करने वाली नीतीश सरकार के बिहार में पिछले 9 सालों में जहरीली शराब से 190 लोगों की मौत की आधिकारिक पुष्टि हुई है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा भयावह है। सारण, सीवान, भोजपुर, गोपालगंज, गया और बक्सर जैसे जिलों में ‘मौत की दारू’ ने सैकड़ों घरों को उजाड़ दिया।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2016 से अब तक 9.36 लाख मामले दर्ज हुए और 14.32 लाख से अधिक गिरफ्तारियां हुईं। लेकिन इन गिरफ्तारियों और मामलों के बावजूद शराब की तस्करी धड़ल्ले से जारी है। 3.86 करोड़ लीटर शराब जब्त हुई, जिसमें से 3.77 करोड़ लीटर को नष्ट भी कर दिया गया। आंकड़ों का पहाड़ बड़ा दिखता है, लेकिन इसका अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र कहीं गहरी पीड़ा लिए हुए है।
शराब माफिया इतने बेखौफ हैं कि कानून enforcement agencies को चकमा देकर अब भी खुलेआम कारोबार कर रहे हैं। हालांकि, सरकार की ओर से ड्रोन और 33 खोजी कुत्तों की मदद से निगरानी के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन नतीजे अब भी ‘मौत की खबर’ के रूप में सामने आ रहे हैं।
इसी दौरान 1.40 लाख वाहन जब्त हुए, जिनमें से 74,725 वाहनों की नीलामी कर सरकार ने 340.55 करोड़ रुपये की आय भी अर्जित की है। यानी शराबबंदी से जानें तो गईं, लेकिन तिजोरी भर गई।