बिहार की राजनीति में शराबबंदी कानून (Manjhi on Sharabbandi) हमेशा बहस का केंद्र रहा है और इस बार इस मुद्दे पर चर्चा को तेज करने वाले हैं केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के प्रमुख जीतन राम मांझी। अपनी बेबाक शैली और स्पष्ट राय के लिए पहचाने जाने वाले मांझी ने एक बार फिर शराबबंदी कानून की समीक्षा की जरूरत पर जोर दिया है।
मांझी ने कहा कि शराबबंदी कानून पर खुलकर बात करना अभी जल्दबाजी होगी, क्योंकि मंत्रिमंडल गठन के बाद ही इस पर ठोस चर्चा संभव है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका रुख किसी राजनीतिक दबाव का परिणाम नहीं है, बल्कि समाज के हित में किए जाने वाले “दिल की सोच” पर आधारित है। मांझी ने यह भी याद दिलाया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद तीन बार इस कानून की समीक्षा की है और समय-समय पर कानून को लचीला बनाने के कदम उठाए गए हैं।
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उनके अनुसार नीतीश कुमार एक “उलझे हुए लेकिन समझदार नेता” हैं, जो हालात के अनुसार अपने फैसलों में सुधार कर सकते हैं। मांझी ने संकेत दिया कि सत्ता में बैठने के बाद नीतीश कुमार एक बार फिर इस कानून की खामियों को ठीक करने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं, क्योंकि प्रशासनिक ढांचे की कमजोरियां कई बार कानून के सही क्रियान्वयन में बाधा बनती हैं।
शराबबंदी पर बयान के अलावा मांझी ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर अपनी गहरी नाराजगी भी जाहिर की। उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी का स्ट्राइक रेट इस बार 84% रहा, जो 2020 के चुनावों की तुलना में अधिक है। इसके बावजूद उन्हें केवल छह सीटें ही मिलीं, जबकि यदि पार्टी को 15 में से कम से कम आठ सीटें मिलतीं, तो HAM को मान्यता प्राप्त पार्टी का दर्जा मिल सकता था। मांझी ने इसे लेकर खुलकर कसक व्यक्त की और कहा कि मान्यता प्राप्त पार्टी होने पर कई सुविधाएं स्वतः मिल जाती हैं, जिनमें पार्टी कार्यालय, वोटर लिस्ट की उपलब्धता और प्रशासनिक अधिकार शामिल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी इन सुविधाओं की हकदार है, लेकिन अभी तक उन्हें इसका लाभ नहीं मिला।






















