बिहार की राजनीति में 2025 का विधानसभा चुनाव (Bihar Savarn Politics) एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक बदलाव का संकेत बनकर उभरा है। करीब साढ़े तीन दशक तक प्रदेश की सत्ता के केंद्र में OBC–EBC समुदायों की जबरदस्त पकड़ रही, लेकिन इस बार सवर्ण जातियों की अभूतपूर्व वापसी ने राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दे दी है। भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ जातियों की राजनीतिक भूमिका लंबे समय बाद फिर से प्रभावी दिखाई दी, जिसने बिहार की सत्ता संरचना में नए ‘सामाजिक बैलेंस’ की शुरुआत कर दी है।
बीते 35 वर्षों में सवर्ण समुदाय की सत्ता में हिस्सेदारी सीमित हो गई थी, लेकिन इस चुनाव ने उस ट्रेंड को पलट दिया। 2025 के नतीजों में कुल 73 सवर्ण विधायक चुने गए, जो विधानसभा की 30% सीटों के बराबर हैं। इनमें 32 राजपूत, 25 भूमिहार, 14 ब्राह्मण और 2 कायस्थ विधायक शामिल हैं। यह संख्या स्पष्ट संकेत देती है कि जातीय राजनीति के केंद्र में सवर्ण समाज की ताकत फिर से उभर रही है।
बेटे को मंत्री बनाकर गलती किए उपेन्द्र कुशवाहा ! इतने नेताओं ने पार्टी से दिया इस्तीफ़ा..
नई सरकार के गठन में भी यह बदलाव साफ दिखा। मंत्रीमंडल के 26 मंत्रियों में से 8 सवर्ण नेता शामिल हुए, यानी लगभग एक-तिहाई प्रतिनिधित्व। यह वह परिदृश्य है जो पिछले तीन दशकों के राजनीतिक ट्रेंड में शायद ही कभी देखने को मिला हो।
एनडीए ने इस सामाजिक रुझान को भांपते हुए बड़े पैमाने पर सवर्ण उम्मीदवारों पर दांव लगाया। भाजपा ने 49, जदयू ने 22, एलजेपी (रामविलास) ने 12, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा ने 2, और आरएलएसपी ने 2 सवर्ण उम्मीदवार उतारे। आश्चर्यजनक रूप से महागठबंधन ने भी पहली बार बड़े पैमाने पर सवर्ण चेहरों को मैदान में उतारकर अपनी परंपरागत रणनीति से अलग रुख अपनाया। खासकर RJD की रणनीति ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाया, जिसने मतदान पैटर्न को नया आयाम दे दिया।
इस चुनाव ने यह साफ कर दिया कि बिहार की राजनीति में अब सवर्ण नेतृत्व की अनदेखी करना किसी भी दल के लिए संभव नहीं है। मंडल–कमंडल राजनीति की लड़ाई अब एक नए सामाजिक समीकरण में बदलती दिख रही है, जहां हर दल को सवर्ण–ओबीसी–ईबीसी–दलित संतुलन को समझकर रणनीति तय करनी होगी।






















