बिहार की राजनीति में मंगलवार का दिन ऐतिहासिक होने वाला है, क्योंकि नौ बार के विधायक और बीजेपी के वरिष्ठ नेता डॉ. प्रेम कुमार को राज्य विधानसभा का 18वां अध्यक्ष चुना जाना लगभग तय है। सोमवार को उन्होंने अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल कर दिया और चूंकि उनके सामने कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है, इसलिए उनका निर्विरोध चयन सुनिश्चित माना जा रहा है। इसकी औपचारिक घोषणा विधानसभा सत्र के दूसरे दिन कर दी जाएगी।
बिहार में इस बार 100 से अधिक विधायक पहली बार सदन तक पहुंचे हैं, ऐसे में एक अनुभवी, नियमों के जानकार और प्रशासनिक समझ वाले नेता की जरूरत को देखते हुए बीजेपी ने यह रणनीतिक दांव खेला है। डॉ. प्रेम कुमार न केवल अनुभवी विधायी कार्यकर्ता हैं, बल्कि संगठनात्मक और सदन संचालन की समझ भी रखते हैं। यही कारण है कि उनका नाम वर्षों से स्पीकर पद की चर्चा में छाया रहा है।
विजय कुमार सिन्हा और नंदकिशोर यादव के बाद वे बीजेपी कोटे से तीसरे स्पीकर होंगे, जबकि इससे पहले जेडीयू के उदय नारायण चौधरी और विजय कुमार चौधरी इस पद को संभाल चुके हैं।
नामांकन के बाद पत्रकारों से बातचीत में डॉ. कुमार ने स्पष्ट कहा कि वे सदन को प्रक्रिया और नियमावली के अनुसार चलाएंगे और उनकी कोशिश होगी कि सभी दलों को साथ लेकर लोकतांत्रिक परंपराओं को सुदृढ़ किया जाए। उन्होंने विशेष रूप से नए विधायकों के लिए आयोजित होने वाली कार्यशाला का उल्लेख किया, जिसमें उन्हें प्रश्नकाल, शून्यकाल, तारांकित व अतारांकित प्रश्नों की विस्तृत जानकारी दी जाएगी।
बिहार विधानसभा में 2025 के चुनाव के बाद जो नया विधायी स्वरूप बना है, उसमें अनुभवी नेताओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। नई पीढ़ी को विधायी कार्यपद्धति से परिचित कराना, सदन की गरिमा को बनाए रखना और बहस की गुणवत्ता को सुधारना, इन सब जिम्मेदारियों को निभाने में डॉ. प्रेम कुमार की भूमिका निर्णायक रहेगी।
1990 से अब तक – लगातार नौ बार विधायक, दस विभागों में मंत्री
डॉ. प्रेम कुमार 1990 में पहली बार विधायक बने और उसके बाद 1995, 2000, 2005 (फरवरी और अक्टूबर), 2010, 2015, 2020 और 2025 में भी लगातार जीत दर्ज करते रहे। मगध विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त करने वाले डॉ. कुमार को अत्यंत पिछड़ा वर्ग के प्रभावशाली नेता के रूप में भी जाना जाता है।
वे 2015 से 2017 तक नेता प्रतिपक्ष रहे और जेपी आंदोलन से राजनीति की शुरुआत करने के बाद अब तक 10 से अधिक विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। पहली बार 2005 में नीतीश सरकार में मंत्री बने और बाद के वर्षों में पथ निर्माण, नगर विकास सहित कई अहम मंत्रालयों में अपनी छाप छोड़ी।
राजनीतिक संकेत – बीजेपी का ‘अंदरूनी संतुलन’ साधने का बड़ा कदम
डॉ. प्रेम कुमार को स्पीकर बनाने का फैसला सिर्फ एक संवैधानिक पद की नियुक्ति नहीं, बल्कि बीजेपी की एक सोची-समझी राजनीति का संकेत भी है। अत्यंत पिछड़ा वर्ग में उनकी मजबूत पकड़, संगठन के प्रति उनकी निष्ठा और दो दशक से अधिक का कार्यकारी अनुभव उन्हें न सिर्फ बीजेपी बल्कि पूरे सदन के लिए स्वीकार्य बनाता है। यह कदम बीजेपी के भीतर जातीय संतुलन साधने, वरिष्ठ नेताओं को सम्मान देने और विधानसभा में अपनी बौद्धिक उपस्थिति को मजबूत करने का संकेत माना जा रहा है।






















