बिहार विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त (Bihar Election Defeat) के बाद राष्ट्रीय जनता दल के भीतर मंथन नहीं बल्कि असंतोष की तेज आंच महसूस की जा रही है। हार की समीक्षा के नाम पर शुरू हुई बैठकों में अब पार्टी की संगठनात्मक कमजोरियां, टिकट वितरण की रणनीति और शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच जैसे मुद्दे खुलकर सामने आने लगे हैं। प्रदेश राजद कार्यालय में चल रही प्रमंडलवार समीक्षा बैठकें केवल चुनावी हार के कारणों को तलाशने तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि ये बैठकें अब संगठन बनाम उम्मीदवार की बहस का मंच बनती जा रही हैं।
दूसरे चरण की इन बैठकों में जिला और प्रदेश स्तर के पदाधिकारी बड़ी संख्या में हिस्सा ले रहे हैं और यही तबका अब सबसे ज्यादा नाराज़ नजर आ रहा है। पहले चरण में चुनाव लड़ चुके उम्मीदवारों के साथ संवाद किया गया था, जहां अधिकांश प्रत्याशियों ने संगठन से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने की शिकायत की थी। लेकिन जैसे ही संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारियों की बारी आई, तस्वीर उलटती चली गई। उनका कहना है कि टिकट वितरण में स्थानीय संगठन और जमीनी नेताओं को दरकिनार कर दिया गया, जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट गया।
प्रदेश और जिला स्तर के नेताओं का आरोप है कि कई सीटों पर ऐसे चेहरों को उम्मीदवार बना दिया गया, जिनकी न तो क्षेत्र में पहचान थी और न ही राजनीतिक पकड़। नेतृत्व के इस फैसले से वे कार्यकर्ता हतोत्साहित हुए, जो वर्षों से टिकट की आस लगाए संगठन के लिए काम कर रहे थे। जिन नेताओं को अचानक बाहर से लाकर चुनाव मैदान में उतारा गया, उनसे न तो आम समर्थक परिचित थे और न ही खुद पार्टी के पदाधिकारी। इसका सीधा असर चुनावी अभियान और बूथ स्तर की सक्रियता पर पड़ा।
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इन बैठकों में टिकट वितरण से जुड़ी कथित लेन-देन की चर्चाएं भी सामने आई हैं। हालांकि ये आरोप अभी औपचारिक रूप से दर्ज नहीं हुए हैं, लेकिन संगठन के भीतर इस तरह की बातें तैरने से पार्टी की छवि और अनुशासन पर सवाल खड़े हो गए हैं। पदाधिकारियों का कहना है कि अगर उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया पारदर्शी होती और स्थानीय नेताओं को भरोसे में लिया गया होता, तो हालात इतने खराब नहीं होते।
नाराजगी केवल उम्मीदवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि शीर्ष नेतृत्व के कामकाज के तरीके पर भी उंगलियां उठ रही हैं। कई पदाधिकारियों का आरोप है कि पार्टी नेतृत्व से मिलने के लिए उन्हें कई-कई दिनों तक इंतजार करना पड़ा। यहां तक कि नेता से मिलने की कोशिश में सुरक्षा कर्मियों द्वारा अपमानजनक व्यवहार झेलने की शिकायतें भी सामने आई हैं। जो लोग किसी तरह मुलाकात कर पाए, वे भी खुलकर बात नहीं रख सके क्योंकि निजी बातचीत का मौका ही नहीं मिला।
समीक्षा प्रक्रिया में जिस सर्वे के आधार पर उम्मीदवार चुने गए, उस पर भी सवालों का साया है। कुछ सीटों पर आरोप है कि सर्वे को जानबूझकर प्रभावित किया गया ताकि खास चेहरों को टिकट मिल सके। जिलों से आ रही इन शिकायतों ने प्रदेश नेतृत्व को असमंजस में डाल दिया है। पार्टी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह तय करने की है कि रिपोर्ट किस आधार पर तैयार की जाए और किन लोगों पर कार्रवाई हो।
हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से यह संकेत जरूर दिए गए हैं कि चुनाव के दौरान पार्टी लाइन से हटकर काम करने वालों और उम्मीदवारों को नुकसान पहुंचाने वालों पर सख्त कार्रवाई हो सकती है। माना जा रहा है कि इस प्रक्रिया के बाद सैकड़ों बागियों और असहयोगी नेताओं पर गाज गिर सकती है।






















