BJP 2026 election: 2025 का साल भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए अपेक्षाकृत सफल रहा। जहां कई राज्यों में भाजपा की सरकारें बरकरार रहीं, वहीं दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) को हराकर पार्टी ने अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की। इसके बाद बिहार में भी सबसे बड़ी पार्टी BJP ही बनी और एनडीए की सरकार बनी। लेकिन 2026 में भाजपा के सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं, जो पार्टी के लिए राजनीतिक “वाटर लू” साबित हो सकती हैं। दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्य जहां भाजपा की पकड़ कमज़ोर है, वहां चुनावी परिस्थितियां उलझी हुई हैं।
2026 का साल भारतीय जनता पार्टी के लिए अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा हो सकती है। पार्टी के भीतर जनरेशन शिफ्ट की प्रक्रिया चल रही है, जिसमें नितिन नवीन जैसे नेताओं का राजनीतिक अनुभव सीमित दिख रहा है। वहीं, सहयोगी दलों के अंदर भी असंतोष बढ़ रहा है। चर्चा तो यह भी होती रहती है कि कहीं नीतीश कुमार, चंद्रबाबू नायडू और एकनाथ शिंद जैसे नेता एनडीए से दूरी बनाकर किसी नई राजनीतिक पालकी में शामिल होने की संभावना तलाश न लें।
पूर्वोत्तर में हेमंता बिस्वा सरमा की भूमिका भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगी। असम में कांग्रेस की रणनीति और प्रियंका गांधी की सक्रियता अगर कामयाब हुई, तो भाजपा की पकड़ कमजोर हो सकती है। वहीं बंगाल, तमिलनाडु और केरल में पार्टी की चुनावी संभावनाएं बहुत सीमित हैं। बंगाल में भाजपा 2019 लोकसभा चुनाव में 45% वोट शेयर के बावजूद विधानसभा चुनाव में पिछड़ गई थी। इसी तरह, तमिलनाडु और केरल में भाजपा का चुनावी स्पेस लगभग नगण्य है।
भाजपा का हिंदुत्व आधारित चुनावी नैरेटिव हिंदी भाषी राज्यों में सीमित सफलता दे सकता है, लेकिन दक्षिण और पूर्वोत्तर में यह प्रभाव कम है। बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीतिक चाल, तमिलनाडु में DMK-AIADMK की सक्रियता और केरल में वाम मोर्चा व कांग्रेस की मजबूत पकड़ भाजपा की संभावनाओं को चुनौती देती है।
उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा ने कुछ हद तक चुनावी स्पेस बनाया है, लेकिन ये राज्य पार्टी की केंद्रीय सत्ता का आधार हैं। पश्चिम बंगाल, दक्षिण और पूर्वोत्तर की चुनौतियों के बिना, मोदी-शाह जोड़ी के लिए 272 लोकसभा सीटों तक पहुँच पाना कठिन होगा। भाजपा के पास कुछ राज्यों में केवल अपेक्षाकृत छोटे संसाधन और जनाधार है, जिससे बड़े पैमाने पर जीत हासिल करना चुनौतीपूर्ण होगा।
भाजपा की आगामी रणनीति पर केंद्रित सवाल यह है कि क्या पार्टी जनाधार के आधार पर दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत कर पाएगी। अगर नहीं, तो 2026 नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए सत्ता की स्थिरता के लिहाज से निर्णायक साबित हो सकता है।
भाजपा के लिए 2026 केवल चुनावी साल नहीं, बल्कि पार्टी के अंदरूनी नेतृत्व, सहयोगी दलों और राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता संतुलन की परीक्षा है। मई-जून तक स्पष्ट हो जाएगा कि पार्टी अपने एजेंडे को कितने हद तक लागू कर पाई और मोदी-शाह की राजनीतिक मियाद कितने दिनों तक कायम रह पाएगी।




















