यूजीसी के नये नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है और कहा है कि फिलहाल 2012 के नियम ही प्रभावी होंगे. कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह कहा है कि नियमों में कुछ अस्पष्टता है, जिसकी वजह से इसका बेजा इस्तेमाल हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को करने के लिए कहा है.
उत्तर बिहार में कोहरे का कहर: पूर्वी-पश्चिमी चंपारण, गोपालगंज, सीतामढ़ी, शिवहर, मधुबनी अलर्ट पर!
यूजीसी के नये नियमों पर जेनरल कैटेगरी के लोगों ने आपत्ति जताई थी और कहा था कि यह भेदभाव पूर्ण है और इसका गलत इस्तेमाल सामान्य श्रेणी के छात्रों के खिलाफ किया जा सकता है. दरअसल यूजीसी ने रोहित वेमुला और पायल तड़वी की आत्महत्या के बाद संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को मिटाने के लिए नये नियम 13 जनवरी को जारी किये थे, जिसमें एससी–एसटी के साथ ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं को शामिल किया था.
यूजीसी ने 2012 में संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को मिटाने के लिए एक नया कानून बनाया था, जिसके तहत एससी–एसटी वर्ग से आने वाले लोगों को जाति आधारित भेदभाव से बचाने के लिए नियम बनाए गए थे. इस नियम का उद्देश्य अनुशासन कायम करना है, ताकि जातिगत भेदभाव ना हो. यह नियम बहुत सख्त नहीं थे और इसमें गलत शिकायत करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई और दंड का प्रावधान था. सुप्रीम कोर्ट, यूजीसी के नये नियमों की जांच करेगा और यह देखेगा कि क्या नियम जाति, धर्म और लिंग के आधार पर किसी तरह का कोई भेदभाव तो नहीं कर रहा है. इसकी वजह यह है कि संविधान में इस तरह के भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है. यहां गौर करने वाली बात यह है कि संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 15(5) के तहत SC/ST/OBC के लिए विशेष प्रावधान करने की स्वतंत्रता राज्य को है. सुप्रीम कोर्ट यह भी देखेगा कि नये नियम कहीं किसी खास जाति के खिलाफ भेदभाव पूर्ण तो नहीं हैं.






















