बिहार की आर्थिक सेहत (Bihar Economy Crisis) और सरकार के विकास दावों को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। राष्ट्रीय जनता दल के नेता शक्ति सिंह यादव ने बिहार सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक तीखा पोस्ट किया है। उन्होंने राज्य की प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा-स्वास्थ्य की स्थिति और बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बिहार में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन आय महज 150 से 190 रुपये के बीच है, जो देश में सबसे निचले स्तर पर है। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि पिछले दो दशकों में विकास की दिशा आखिर क्या रही।
शक्ति सिंह यादव ने पोस्ट में दावा किया कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी सूचकांकों में बिहार लगातार पिछड़ता चला गया है, जबकि पलायन के मामले में राज्य शीर्ष पर पहुंच चुका है। उन्होंने ई-श्रम पोर्टल के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि करीब 2 करोड़ 90 लाख बिहारी रोज़गार की तलाश में दूसरे राज्यों में दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं। यह आंकड़ा केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता की ओर भी इशारा करता है।
आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों को लेकर भी राजद नेता ने गहरी चिंता जताई है। उनके अनुसार बिहार में जन्म लेने वाला हर बच्चा औसतन 25 से 30 हजार रुपये के कर्ज के बोझ के साथ पैदा हो रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य का खजाना इतनी खराब स्थिति में है कि बिहार के वित्त मंत्री को केंद्र सरकार से एक लाख करोड़ रुपये से अधिक कर्ज लेने की अनुमति मांगनी पड़ रही है। यह स्थिति राज्य की वित्तीय स्थिरता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
सरकार की स्वरोज़गार से जुड़ी दो लाख रुपये की योजना को लेकर भी शक्ति सिंह यादव ने इसे “महज छलावा” करार दिया है। उन्होंने कहा कि योजना के तहत पहले 10 हजार रुपये देकर शर्त रखी जाती है कि लाभार्थी को प्रोग्रेस रिपोर्ट दिखानी होगी, तभी पूरी राशि मिलेगी। आरोप है कि इस शुरुआती राशि में भी प्रखंड स्तर पर कमीशनखोरी के चलते पैसा कट जाता है और अंत में लाभार्थी के हाथ 7-8 हजार रुपये ही बचते हैं। इतनी रकम में कोई टिकाऊ रोजगार खड़ा होना संभव नहीं है।
राजद नेता ने वित्तीय गणित रखते हुए कहा कि अगर इस योजना को वास्तविक रूप से लागू किया जाए तो करीब 3 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी, जबकि बिहार का कुल बजट ही लगभग 3 लाख 18 हजार करोड़ रुपये है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर इतना पैसा सिर्फ एक योजना में लगाया जाएगा तो सरकारी कर्मचारियों के वेतन और बुजुर्गों की पेंशन के लिए संसाधन कहां से आएंगे। उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इस कथित वित्तीय कुप्रबंधन पर जवाब मांगते हुए कहा कि बिहार को नारों से नहीं, ठोस आर्थिक नीतियों से आगे बढ़ाने की जरूरत है।






















