केंद्रीय बजट को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है और इस बार निर्दलीय सांसद पप्पू यादव (Budget 2026 Controversy) ने केंद्र और बिहार सरकार दोनों पर एक साथ तीखा प्रहार किया है। बजट को ‘आम आदमी विरोधी’ करार देते हुए उन्होंने कहा कि यह पूरा बजट देश के पूंजीपतियों और चुनिंदा उद्योगपतियों के इर्द-गिर्द घूमता नजर आता है, जबकि बिहार, युवा, किसान और मध्यम वर्ग एक बार फिर हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। पप्पू यादव का कहना है कि जिस बिहार से सबसे ज्यादा उम्मीदें होती हैं, उसी बिहार का नाम बजट में ढूंढे नहीं मिलता।
उन्होंने बीते वर्षों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान तो किया, लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि वह राशि खर्च ही नहीं हो सकी। पप्पू यादव ने सवाल उठाया कि जब पहले से आवंटित पैसा उपयोग में नहीं आया, तो नए बजट में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों को लगभग गायब क्यों कर दिया गया। उनके मुताबिक यह बजट भविष्य निर्माण की बजाय आंकड़ों का खेल बनकर रह गया है।
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बिहार को लेकर सांसद का आक्रोश और भी तीखा दिखा। उन्होंने कहा कि अब बजट का मतलब राज्यों के विकास से ज्यादा चुनावी गणित तक सिमट गया है। जहां चुनाव होते हैं, वहीं योजनाओं की बौछार होती है और जहां जरूरत सबसे ज्यादा है, वहां सिर्फ आश्वासन बचते हैं। पप्पू यादव ने आरोप लगाया कि बुनकर, किसान, स्टार्टअप, छोटे व्यापारी, नौकरीपेशा वर्ग और युवा सभी इस बजट से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। इनकम टैक्स को लेकर भी उन्होंने सरकार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि बड़े दावों के बाद आखिरकार सरकार पुराने स्लैब पर ही लौट आई, जिससे मध्यम वर्ग की उम्मीदें टूट गईं।
सरकार के कर्ज और खर्च पर सवाल उठाते हुए पप्पू यादव ने दावा किया कि केंद्र ने करीब 1 लाख 86 हजार करोड़ रुपये का कर्ज लिया, लेकिन उसका लाभ आम आदमी तक नहीं पहुंचा। उन्होंने आरोप लगाया कि विकास योजनाओं की बजाय सरकार का ज्यादा जोर प्रचार और विज्ञापनों पर रहा, जिससे जनता की वास्तविक समस्याएं पीछे छूट गईं। बिहार को बजट में कुछ न मिलने पर उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “Budget से B मतलब बिहार ग़ायब” और आम बजट का नाम बदलकर “चुनावी चू-चू का मुरब्बा” रख देना चाहिए, ताकि सच्चाई खुलकर सामने आ सके।






















