लोकसभा में कार्यवाही (Lok Sabha Standoff) बार-बार बाधित होने के पीछे के कारणों पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के तीखे बयान ने संसद के मौजूदा सत्र को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। राहुल गांधी ने कहा कि विवाद की जड़ कुछ दिन पहले सामने आए पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की किताब के मुद्दे से जुड़ी है। उनके मुताबिक सरकार नहीं चाहती थी कि इस विषय पर सदन में चर्चा हो, इसलिए व्यवस्थित तरीके से कार्यवाही रोकी गई और उन्हें बोलने से रोका गया। राहुल ने यह भी आरोप लगाया कि रक्षा मंत्री ने सदन में यह कहकर भ्रम फैलाया कि किताब प्रकाशित नहीं हुई है, जबकि किताब प्रकाशित हो चुकी है और उसकी प्रति विपक्ष के पास मौजूद है। इस पूरे घटनाक्रम को उन्होंने लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ बताया और कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर विपक्ष को बोलने से रोकना संसदीय परंपराओं का उल्लंघन है।
राहुल गांधी ने आगे यह सवाल भी उठाया कि सदन में कुछ सदस्यों द्वारा किताबों के हवाले देकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, जबकि विपक्षी सांसदों का निलंबन कर दिया गया। उन्होंने यह आरोप भी खारिज किया कि विपक्षी सदस्य प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए खतरा थे। राहुल के अनुसार प्रधानमंत्री सदन में आने से इसलिए कतराते रहे क्योंकि वे विपक्ष की उन बातों का सामना नहीं करना चाहते थे जो सरकार के दावों और फैसलों पर सीधा सवाल उठाती हैं। उनका दावा है कि यह टकराव किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि सच से बचने की प्रवृत्ति का नतीजा है, जिसने संसद को ठप कर दिया।
इसी सियासी माहौल में समाजवादी पार्टी के सांसद अखिलेश यादव ने भी सरकार के रुख पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विपक्ष सदन चलाना चाहता है, क्योंकि ऐसे समय में बहस और जवाबदेही और ज्यादा जरूरी हो जाती है जब देश की अर्थव्यवस्था और विदेशी निवेश से जुड़ी बड़ी घोषणाएं सामने आ रही हों। अखिलेश ने अमेरिका के साथ हुई हालिया बड़ी डील का जिक्र करते हुए कहा कि यह डील नहीं, बल्कि ढील जैसी प्रतीत हो रही है और इसके असर पर खुली चर्चा होनी चाहिए। उनके मुताबिक 1991-92 के बाद इतने बड़े पैमाने पर बाजार खोले जाने के फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे और सरकार को आंकड़ों, शर्तों और संभावित जोखिमों पर विपक्ष के सवालों का सीधा जवाब देना चाहिए।
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाने की चर्चा ने सत्र के राजनीतिक तापमान को और बढ़ा दिया है। अखिलेश यादव ने कहा कि स्पीकर का सम्मान सदन की गरिमा से जुड़ा होता है और इस विषय पर बातचीत जारी है, देखना होगा कि आगे क्या नतीजा निकलता है। विपक्ष का तर्क है कि सदन की कार्यवाही निष्पक्ष तरीके से संचालित होनी चाहिए ताकि सरकार के फैसलों पर लोकतांत्रिक ढंग से सवाल उठाए जा सकें। वहीं सरकार पर आरोप है कि वह असहज सवालों से बचने के लिए व्यवधान और निलंबन का सहारा ले रही है।




















