उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र की शुरुआत इस बार एक अलग ही तस्वीर के साथ हुई। आमतौर पर जब सदन में जनप्रतिनिधियों की एंट्री भारी सुरक्षा घेरा, चमचमाती गाड़ियां और काफिले के साथ होती है, उसी वक्त समाजवादी पार्टी के सबसे वरिष्ठ विधायक (90-Year-Old SP MLA) की मौजूदगी ने राजनीति के मौजूदा चलन पर एक मौन सवाल खड़ा कर दिया। करीब 90 की उम्र में भी बिना किसी लाव-लश्कर के, एक साधारण स्कूटी पर पीछे सवार होकर विधानसभा परिसर तक पहुंचना सिर्फ एक दृश्य नहीं था, बल्कि सार्वजनिक जीवन में सादगी और जवाबदेही की याद दिलाने वाला संकेत भी था। सीढ़ियां खुद चढ़ते हुए वे सदन के भीतर दाखिल हुए और कार्यवाही में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया।

कार्यवाही की शुरुआत मुख्यमंत्री और सदन के नेता योगी आदित्यनाथ के शोक प्रस्ताव से हुई। इसके बाद भाजपा विधायक प्रोफेसर श्याम बिहारी लाल और समाजवादी पार्टी के नेता विजय सिंह गोंड के निधन पर सदन ने दो मिनट का मौन रखा। इस गंभीर माहौल में बुजुर्ग विधायक की उपस्थिति ने राजनीतिक शिष्टाचार और संस्थागत परंपराओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। जहां एक ओर उम्र और स्वास्थ्य अक्सर सक्रिय राजनीति से दूरी का कारण बनते हैं, वहीं यहां अनुभव और जिम्मेदारी का भाव हावी नजर आया।
निज़ामाबाद से विधायक आलम बदी की यह एंट्री अचानक वायरल हो गई। वजह सिर्फ उनका स्कूटी पर पहुंचना नहीं, बल्कि उनके जीवन का वह पैटर्न है जो सत्ता के साथ आई सुविधाओं से दूरी बनाकर चलने की मिसाल पेश करता है। बताया जाता है कि वे अक्सर रोडवेज बस से सफर करते हैं, घर की सफाई खुद करते हैं और बेहद सादा जीवन जीते हैं। उनके पास निजी कार तक नहीं है। राजनीति में जहां संसाधनों का प्रदर्शन आम बात है, वहां आलम बदी का यह तरीका जनप्रतिनिधि की उस भूमिका को सामने लाता है जिसमें जनसरोकार पहले और व्यक्तिगत आराम बाद में आता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वे 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को हराकर 18वीं विधानसभा के सदस्य बने। 1996 से निज़ामाबाद सीट से उनका जुड़ाव रहा है और वे 13वीं, 14वीं, 16वीं, 17वीं और 18वीं विधानसभा में चुने गए। बीच में 15वीं विधानसभा में मामूली अंतर से हार के बावजूद उनकी राजनीतिक जमीन कमजोर नहीं पड़ी। लंबे समय तक एक ही क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का मतलब केवल जीत-हार का आंकड़ा नहीं होता, बल्कि क्षेत्रीय मुद्दों पर निरंतर काम और जनता के भरोसे का संकेत भी होता है।
उनकी पृष्ठभूमि भी उन्हें भीड़ से अलग करती है। बताया जाता है कि वे मैकेनिकल इंजीनियर रहे हैं और शुरुआती दौर में गोरखपुर में नौकरी की। बाद में नेहरू, गांधी और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं के विचारों से प्रेरित होकर समाजसेवा और राजनीति की राह चुनी। सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते हुए भी उन्होंने जीवनशैली नहीं बदली। पहले एक सेकेंड हैंड एम्बेसडर कार थी, जिसकी हालत इतनी खराब रहती थी कि बीच रास्ते में जवाब दे जाती थी। अब वे अक्सर किसी कार्यकर्ता की स्कूटी या बाइक से लिफ्ट लेकर विधानसभा पहुंच जाते हैं।
आज के दौर में जब राजनीति पर अक्सर वीआईपी संस्कृति, विशेषाधिकार और दूरी बढ़ने के आरोप लगते हैं, आलम बदी की यह सादगी सोशल मीडिया पर बहस का विषय बन गई है। कई लोग इसे पुराने राजनीतिक मूल्यों की वापसी के तौर पर देख रहे हैं, तो कुछ इसे प्रतीकात्मक संदेश मान रहे हैं कि जनप्रतिनिधि अगर चाहें तो आम आदमी की तरह रहकर भी व्यवस्था के भीतर बदलाव की आवाज उठा सकते हैं। विधानसभा के भीतर उनकी मौजूदगी यह भी बताती है कि उम्र महज एक संख्या है, जिम्मेदारी का भाव उससे बड़ा होता है।

















