Bihar News education: बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सारण जिले के छपरा शहर स्थित राजकीय बालिका उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से जो मामला सामने आया है, उसने पूरे सिस्टम को आईना दिखा दिया है। यहां इंटरमीडिएट विज्ञान संकाय की 126 छात्राओं ने रसायन शास्त्र यानी केमिस्ट्री के नियमित शिक्षक के बिना ही दो साल की पढ़ाई पूरी की और बोर्ड परीक्षा में शामिल हो गईं। अब ये छात्राएं अपने रिजल्ट का इंतजार कर रही हैं, लेकिन उनके संघर्ष की कहानी शिक्षा विभाग की गंभीर लापरवाही को उजागर कर चुकी है।
यह सिर्फ एक स्कूल की समस्या नहीं है, बल्कि यह बताता है कि जमीनी स्तर पर शिक्षा व्यवस्था किस हालत में चल रही है। जिस विषय को प्रयोगात्मक और तकनीकी माना जाता है, उसी विषय की पढ़ाई बिना शिक्षक के कराई गई। छात्राओं ने अपने स्तर पर नोट्स, गाइड, मोबाइल पर ऑनलाइन वीडियो और आपसी समूह अध्ययन के जरिए तैयारी की। कई छात्राओं ने निजी ट्यूशन का सहारा लिया तो कुछ ने सीनियर छात्राओं और आसपास के स्कूलों के शिक्षकों से मार्गदर्शन लिया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वर्ष 2023 में विद्यालय में कार्यरत रसायन विज्ञान के एकमात्र शिक्षक का स्थानांतरण हो गया था। इसके बाद पूरे दो साल तक इस विषय के लिए न तो नया शिक्षक नियुक्त किया गया और न ही किसी दूसरे स्कूल से प्रतिनियुक्ति की गई। इसके बावजूद सत्र 2023 से 2025 तक की छात्राओं को परीक्षा में बैठने दिया गया। यानी बिना शिक्षक के ही पूरी पीढ़ी को पढ़ाई करनी पड़ी।
रसायन विज्ञान जैसे प्रयोगात्मक विषय में प्रयोगशाला और शिक्षक की भूमिका बेहद अहम होती है। लेकिन यहां प्रयोगशालाओं की स्थिति भी खराब पाई गई। कई उपकरण धूल से ढके हुए थे और लैब नियमित रूप से संचालित नहीं हो रही थी। कंप्यूटर लैब की हालत भी संतोषजनक नहीं थी। इसका खुलासा तब हुआ जब सारण के जिलाधिकारी Vaibhav Srivastava मैट्रिक परीक्षा निरीक्षण के दौरान स्कूल पहुंचे।
निरीक्षण के समय जिलाधिकारी ने स्कूल की अव्यवस्था पर नाराजगी जताई। उन्होंने देखा कि फर्नीचर जर्जर हालत में है और प्रयोगशालाएं अव्यवस्थित पड़ी हैं। जब उन्होंने प्राचार्य से शिक्षकों की स्थिति के बारे में पूछा तो पता चला कि इंटर स्तर पर केमिस्ट्री का एक भी शिक्षक कार्यरत नहीं है। यह सुनते ही जिलाधिकारी ने जिला शिक्षा पदाधिकारी Nishant Kiran को तत्काल आवश्यक कार्रवाई का निर्देश दिया।
जिलाधिकारी ने साफ कहा कि छात्राओं को गुणवत्तापूर्ण प्रयोगात्मक शिक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने प्रयोगशालाओं की साफ-सफाई, उपकरणों की मरम्मत और शिक्षक की प्रतिनियुक्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। साथ ही विद्यालय परिसर में फर्नीचर की मरम्मत, पेंटिंग और समुचित रख-रखाव का आदेश भी दिया गया ताकि छात्राओं को बेहतर शैक्षणिक माहौल मिल सके।
इस विद्यालय की स्थापना 1950 के दशक में बालिकाओं की उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी। उस समय यह स्कूल क्षेत्र में लड़कियों की पढ़ाई का बड़ा केंद्र माना जाता था। समय के साथ छात्राओं की संख्या लगातार बढ़ती गई, लेकिन शिक्षक और संसाधन उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाए। स्थानांतरण के बाद खाली पदों को भरने में देरी, नियमित बहाली प्रक्रिया का सुस्त होना और बजट की सीमाएं इस गिरती व्यवस्था की बड़ी वजह बनीं।
छात्राओं की कहानी यहां सबसे प्रेरक पहलू है। बिना नियमित शिक्षक के भी उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने किताबों, मोबाइल और आपसी सहयोग से पढ़ाई जारी रखी। कई छात्राओं ने कहा कि उन्हें केमिस्ट्री समझने में काफी परेशानी हुई, लेकिन परीक्षा छोड़ना उनके लिए विकल्प नहीं था। उन्होंने खुद को साबित करने के लिए कठिन हालात में भी मेहनत जारी रखी।






















