देशव्यापी ट्रेड यूनियनों द्वारा बुलाए गए भारत बंद (Bharat Bandh Bihar) का असर गुरुवार को बिहार के कई जिलों में स्पष्ट रूप से देखने को मिला। राजधानी पटना से लेकर कटिहार, मधेपुरा, आरा और बक्सर तक मजदूर संगठनों और बैंक कर्मचारियों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया। खासकर पटना के डाकबंगला चौराहे पर लगभग दो हजार प्रदर्शनकारियों की मौजूदगी ने बंद के व्यापक प्रभाव का संकेत दिया, जबकि कटिहार में NH-31 जाम होने से वाहनों की लंबी कतारें लग गईं और आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा।
यह बंद केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए चार नए श्रम संहिताओं (लेबर कोड) के खिलाफ बुलाया गया है, जिसे ट्रेड यूनियन मजदूर विरोधी बताते हुए वापस लेने की मांग कर रही हैं। देश के करीब दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों, विभिन्न फेडरेशन और कर्मचारी संगठनों ने संयुक्त रूप से इस हड़ताल का आह्वान किया है, जिसके चलते बैंकिंग, बिजली, परिवहन, बीमा, स्वास्थ्य सेवाओं और जलापूर्ति जैसी आवश्यक सेवाओं पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
पटना में प्रदर्शनकारियों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए श्रम कानूनों में किए गए बदलावों को मजदूरों के अधिकारों पर हमला बताया। माले की एमएलसी शशि यादव ने कहा कि चार श्रम कोड पुराने 29 श्रम कानूनों की जगह लेने जा रहे हैं, जिससे कर्मचारियों के अधिकार कमजोर होंगे और ट्रेड यूनियन बनाना अधिक कठिन हो जाएगा। उन्होंने इसे मजदूरों के लिए ‘गुलामी’ की तरह बताते हुए कहा कि अगर सरकार ने बिल वापस नहीं लिया तो आंदोलन और व्यापक होगा।
प्रदर्शन में शामिल नेताओं और संगठनों का आरोप है कि नए श्रम कोड से यूनियन रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया कठिन हो जाएगी और छोटे संगठनों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा होगा। पटना नगर निगम चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी संघ के अध्यक्ष जितेंद्र कुमार ने कहा कि पहले कम संख्या में कर्मचारी मिलकर यूनियन बना सकते थे, लेकिन अब अधिक संख्या की शर्तें छोटे संगठनों को कमजोर कर देंगी। उनका कहना है कि न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, पीएफ, ईएसआई, ग्रेच्युटी और आठ घंटे कार्यदिवस जैसे अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं।
माले विधायक संदीप सौरभ ने भी प्रदर्शन में शामिल होकर सरकार पर मजदूरों के अधिकार सीमित करने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि सरकार मजदूरों की एकजुटता से डरती है और इसलिए यूनियन बनाने की क्षमता को कम करना चाहती है। वहीं पार्टी के नेताओं ने केंद्र पर उद्योगपतियों के हित में नीतियां बनाने का आरोप लगाते हुए इसे ‘काला कानून’ बताया।
















