बिहार विधान परिषद में बेतिया राज की जमीनों को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस छिड़ गई। राजद के विधान पार्षद सौरभ कुमार ने सदन में सवाल उठाया कि 1952 से लेकर अब तक जब भी बेतिया राज की जमीनों की खरीद-फरोख्त हुई, तो सरकार किस आधार पर मालगुजारी (भूमि कर) वसूलती रही और रसीद काटती रही? उन्होंने कहा कि अगर बेतिया राज की जमीनें बिहार सरकार की ही नहीं थीं, तो फिर यह वसूली का आधार क्या था?
सौरभ कुमार ने इस मुद्दे को सदन में गंभीरता से उठाते हुए पूछा कि ऐतिहासिक रूप से बेतिया राज की संपत्तियां निजी थीं या सरकारी, और लंबे समय से चली आ रही इस प्रथा पर स्पष्टता की मांग की। इस पर विजय कुमार सिन्हा जवाब देते हुए सदन को अवगत कराया कि बेतिया राज की संपत्तियों को लेकर 2024 में विधानमंडल से ‘बेतिया राज की संपत्तियों को निहित करने वाला विधेयक’ पारित हो चुका है। इस कानून के तहत बेतिया राज की लगभग 15,000 एकड़ से अधिक जमीन (करीब 15,215 एकड़) अब औपचारिक रूप से बिहार राज्य सरकार में निहित हो गई है।
उन्होंने कहा कि नई नियमावली में दावा आपत्ति और सुनवाई की व्यवस्था की जा रही है। यदि विधि संवत दावा पाया जाएगा तो उसकी मान्यता दी जाएगी, इनको घबराने की जरूरत नहीं है। विधि संवत बंदोबस्ती होगी। समस्या थोड़ी जटिल है और सरकार चिंतित है। कई तरह के प्रमाण हैं कि कुछ गलत तत्व, जो उसके संबंध में आज लोगों को परेशान कर रहे हैं, विधि व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।






















