बिहार की राजनीति (Bihar Politics) में महागठबंधन को लेकर चल रही अटकलों के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और बिहार विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के पूर्व नेता शकील अहमद खान का बयान सियासी गलियारों में हलचल मचा रहा है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि बिहार में महागठबंधन अब व्यावहारिक रूप से बचा नहीं है और कांग्रेस को राष्ट्रीय जनता दल के साथ बने रहने से न तो चुनावी लाभ मिल रहा है और न ही संगठनात्मक मजबूती।
शकील अहमद खान के मुताबिक, हालिया चुनावों के बाद दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व स्तर पर गहन मंथन हुआ। इस बैठक में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी समेत शीर्ष नेता मौजूद थे। बिहार चुनाव लड़ने वाले सभी 60 उम्मीदवारों और वरिष्ठ नेताओं की राय का विश्लेषण करने के बाद यह निष्कर्ष सामने आया कि जिस गठबंधन से न वोट बढ़ रहे हैं और न सीटें, उससे अलग राह बनाना ही राजनीतिक रूप से सही विकल्प है।
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उन्होंने कहा कि कांग्रेस लगातार महागठबंधन का हिस्सा रहते हुए अपने जनाधार को खो रही है। न तो पार्टी की सीटों की संख्या में इजाफा हो रहा है और न ही वोट प्रतिशत में कोई सकारात्मक बदलाव दिख रहा है। इसके उलट, कांग्रेस के पारंपरिक वोटर धीरे-धीरे उससे दूर होते जा रहे हैं। उनका मानना है कि शीर्ष नेतृत्व राज्य इकाई की जमीनी सच्चाई को समझता है और आने वाले समय में कांग्रेस को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक दिशा तय करनी होगी, भले ही इसके लिए संघर्ष का रास्ता क्यों न अपनाना पड़े।
शकील अहमद खान ने इस बयान के जरिए न सिर्फ महागठबंधन की मजबूती पर सवाल उठाए, बल्कि विपक्ष की भूमिका को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की हालिया विदेश यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि बिहार की जनता एक मजबूत और सक्रिय विपक्ष की उम्मीद करती है, जो सरकार को हर मोर्चे पर घेरे और आम लोगों की आवाज बने। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में विपक्ष की भूमिका कमजोर दिखाई दे रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि जब राज्य बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था की गिरावट और कानून-व्यवस्था जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रहा है, तब नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। ऐसे समय में राजनीतिक प्राथमिकताएं जनता के मुद्दों पर केंद्रित होनी चाहिए थीं। विपक्ष की इस कथित कमजोरी का सीधा फायदा सत्ताधारी दलों को मिल रहा है, जिससे लोकतांत्रिक संतुलन प्रभावित हो रहा है।






















