बिहार विधानसभा के बजट सत्र (Bihar Assembly Budget Session) के पांचवें दिन की कार्यवाही शुरू होते ही सदन में राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ गया। प्रश्नकाल के दौरान पंचायत प्रतिनिधियों को आर्म्स लाइसेंस दिए जाने के लंबित मामलों ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। विधायक ने सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाते हुए कहा कि मुख्यमंत्री के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर स्थिति बदली नहीं है। राज्य के कई जिलों में पंचायत प्रतिनिधि वर्षों से लाइसेंस के लिए आवेदन किए बैठे हैं, लेकिन जिलाधिकारी स्तर पर फाइलें आगे नहीं बढ़ रही हैं। यह स्थिति प्रशासनिक उदासीनता और नीति के क्रियान्वयन में अंतर को उजागर करती है।
विधायक ने सदन को बताया कि यह केवल कागजी देरी नहीं, बल्कि पंचायत स्तर पर सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर सवाल है। ग्रामीण इलाकों में पंचायत प्रतिनिधि सामाजिक विवाद, भूमि विवाद और स्थानीय तनावों के बीच काम करते हैं। ऐसे में लाइसेंस की प्रक्रिया का वर्षों तक लटका रहना उनकी सुरक्षा व्यवस्था पर सीधा असर डालता है। उन्होंने यह भी कहा कि दो से तीन साल से लंबित आवेदनों के कारण जनप्रतिनिधियों में निराशा बढ़ रही है और सरकार के आदेशों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्षेत्रीय दौरों के दौरान जब प्रतिनिधि उनसे जवाब मांगते हैं, तो उनके पास कहने को कुछ नहीं होता, क्योंकि फाइलें प्रशासनिक गलियारों में अटकी पड़ी हैं।
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सदन में उठे इस मुद्दे ने सरकार को तुरंत स्थिति स्पष्ट करने पर मजबूर कर दिया। गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने स्वीकार किया कि मामलों के निस्तारण में देरी अनुचित है और इससे सरकार की मंशा पर गलत संदेश जाता है। उन्होंने कहा कि इस विषय को प्राथमिकता के आधार पर लिया गया है और गृह विभाग ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अब ऐसे आवेदनों पर अधिकतम 60 दिनों के भीतर निर्णय लेना अनिवार्य किया जाएगा ताकि वर्षों से अटकी फाइलें समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ सकें।
गृह मंत्री के बयान ने यह संकेत दिया कि सरकार प्रशासनिक ढांचे में मौजूद सुस्ती को लेकर अब सख्ती दिखाने के मूड में है। हालांकि, विपक्ष ने यह सवाल भी उठाया कि यदि मुख्यमंत्री के आदेश पहले से मौजूद थे, तो उन्हें लागू कराने में इतनी देरी क्यों हुई। इस बहस के बीच सदन में हंगामे जैसी स्थिति बन गई और कार्यवाही कुछ समय के लिए बाधित भी हुई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा केवल आर्म्स लाइसेंस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बिहार में नीति और क्रियान्वयन के बीच मौजूद अंतर को उजागर करता है।






















