पटना: आज़ादी के बाद बिहार में 1957 में दूसरा विधानसभा चुनाव हुआ, जिसमें कांग्रेस (इंडियन नेशनल कांग्रेस) ने लगातार दूसरी बार सत्ता पर कब्जा जमाया। हालांकि, 1952 के पहले चुनाव की तुलना में कांग्रेस को 29 सीटों का नुकसान हुआ, लेकिन वह फिर भी सबसे बड़ी पार्टी बनी रही। इस चुनाव में राष्ट्रीय दलों का दबदबा कायम रहा और उन्होंने कुल 65% वोटों पर कब्जा जमाया।
कांग्रेस का वर्चस्व बरकरार, 210 विधायक पहुंचे विधानसभा
1957 के चुनाव में कुल 264 सीटें थीं, लेकिन उस समय सुरक्षित 54 सीटों से दो-दो उम्मीदवार जीतकर विधानसभा पहुंचते थे, जिससे कुल 318 विधायक चुने गए। इनमें से 210 विधायक कांग्रेस के थे। कांग्रेस ने 312 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, जिनमें से अधिकांश जीतने में सफल रहे। हालांकि, 1952 के मुकाबले कांग्रेस की सीटें घटीं, फिर भी वह स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रही।
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क्षेत्रीय दलों को सीमित सफलता, निर्दलीयों ने बेहतर प्रदर्शन किया
• प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) और झारखंड पार्टी: दोनों ने 31-31 सीटों पर जीत हासिल की। PSP ने 220 उम्मीदवार और झारखंड पार्टी ने 70 उम्मीदवार उतारे थे।
• जनता (CNPSPJP) पार्टी: 23 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि 119 उम्मीदवार खड़े किए थे।
• भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI): 60 उम्मीदवारों में से सिर्फ 7 को जीत मिली।
• निर्दलीय उम्मीदवार: 16 निर्दलीयों ने भी जीत दर्ज कर विधानसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों ने 20.61% वोट हासिल किए, जबकि क्षेत्रीय दलों के खाते में मात्र 14.91% वोट ही गए।
भारतीय जनसंघ का नहीं खुला खाता
1957 के चुनाव में भारतीय जनसंघ (अब भारतीय जनता पार्टी) ने 30 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन कोई भी जीत दर्ज नहीं कर सका। पार्टी को सिर्फ 1.23% वोट मिले, जिससे उसे निराशा हाथ लगी।
महिलाओं की ऐतिहासिक जीत: 46 में से 30 उम्मीदवार विजयी
1957 के चुनाव में महिलाओं ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। कुल 46 महिला उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा, जिनमें से 30 जीतने में सफल रहीं। यानी 65% महिला उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की, जो उस समय महिलाओं की भागीदारी और सफलता के लिहाज से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।
1957 का बिहार विधानसभा चुनाव कांग्रेस के वर्चस्व को बनाए रखने का संकेत था, लेकिन विपक्षी दलों ने भी धीरे-धीरे अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी थी। राष्ट्रीय दलों का प्रभाव स्पष्ट दिखा, जबकि क्षेत्रीय दलों को सीमित सफलता मिली। निर्दलीयों ने भी बेहतर प्रदर्शन किया, वहीं महिलाओं की जीत ने यह दिखाया कि राजनीति में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ रही थी।






















