वर्ष 1967 का बिहार विधानसभा चुनाव राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। आज़ादी के बाद पहली बार कांग्रेस बहुमत से चूक गई, जिससे राज्य में गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। यह चुनाव बिहार की राजनीति में स्थिरता के अंत और गठबंधन राजनीति की शुरुआत का संकेत था।
कांग्रेस को बहुमत नहीं, पहली बार हारी सत्ता
1967 के इस चुनाव में कुल 318 सीटों पर चुनाव हुए। कांग्रेस ने सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, लेकिन उसे केवल 128 सीटों पर जीत मिली। इस तरह, बिहार में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी बनी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी
• कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी पार्टी बनी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा), जिसने 68 सीटें जीतीं। पार्टी ने कुल 199 सीटों पर चुनाव लड़ा था।
• भारतीय जनसंघ ने 271 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 26 सीटों पर जीत दर्ज की।
• भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) को 24 सीटें मिलीं, जबकि प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) ने 18 सीटें जीतीं।
• निर्दलीयों ने 33 सीटों पर कब्जा जमाया।
• झारखंड पार्टी ने 13 सीटें जीतीं।
महिलाओं की भागीदारी में भारी गिरावट
इस चुनाव में महिलाओं का प्रतिनिधित्व तीन-चौथाई घट गया।
• 1962 के विधानसभा चुनाव में 25 महिलाएं विधायक बनी थीं, लेकिन 1967 में यह संख्या सिर्फ 6 रह गई।
• इस बार महज 29 महिला उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा, जो पहले की तुलना में काफी कम था।
बिहार विधानसभा चुनाव 1957: कांग्रेस की लगातार दूसरी जीत, राष्ट्रीय दलों का दबदबा
महामाया प्रसाद सिन्हा बने मुख्यमंत्री, सरकार मात्र 10 महीने चली
5 मार्च 1967 को गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, जिसमें जन क्रांति दल के नेता महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने। हालांकि, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) के पास कांग्रेस के बाद सबसे अधिक विधायक थे, लेकिन कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने के लिए उन्होंने महामाया प्रसाद सिन्हा को मुख्यमंत्री बनाने पर सहमति दे दी।
• संसोपा के नेता कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री बने।
• लेकिन यह सरकार सिर्फ 10 महीने चली और 28 जनवरी 1968 को गिर गई।
• इसके बाद कांग्रेस सत्ता में वापस लौटी और सतीश प्रसाद सिंह मुख्यमंत्री बने।
• हालांकि, यह सरकार भी ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी और दो साल के भीतर, 1969 में बिहार में फिर से चुनाव हुए।
1967 का चुनाव बिहार में राजनीतिक अस्थिरता के नए युग की शुरुआत थी। यह पहला मौका था जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई, लेकिन गठबंधन की कमजोरी के कारण सरकार ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। 1969 में फिर से चुनाव हुए, जिससे यह साफ हो गया कि बिहार की राजनीति अब अस्थिरता और गठबंधन सरकारों के दौर में प्रवेश कर चुकी थी।






















