बिहार के विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति को लेकर चल रहे विवादों के बीच पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) का ताजा आदेश शिक्षा व्यवस्था और भर्ती प्रक्रिया दोनों के लिए दूरगामी असर वाला माना जा रहा है। बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग की अनुशंसा पर हुई नियुक्तियों में अनियमितता और कथित गड़बड़ियों की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने शैक्षणिक अनुभव प्रमाणपत्र को लेकर स्पष्ट और सख्त व्याख्या दी है। न्यायालय ने यह साफ कर दिया है कि केवल कक्षाओं में कुछ समय पढ़ा देने भर से किसी अभ्यर्थी को औपचारिक अनुभव प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट के आदेश में कहा गया है कि जब तक किसी अभ्यर्थी की विधिवत और औपचारिक नियुक्ति नहीं होती, तब तक वह अनुभव प्रमाणपत्र का अधिकार नहीं रखता। कोर्ट ने विश्वविद्यालयों और कॉलेज प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि बिना वैध नियुक्ति के केवल अध्यापन के आधार पर रजिस्ट्रार द्वारा अनुभव प्रमाणपत्र जारी करना नियमों के खिलाफ है। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब हाल के वर्षों में कई विषयों में हुई नियुक्तियों में अनुभव प्रमाणपत्र को लेकर सबसे अधिक संदेह और विवाद सामने आए हैं।
दरअसल, आयोग और शिक्षा विभाग तक पहुंची शिकायतों में यह आरोप लगाया गया है कि कई कॉलेजों ने निर्धारित मानकों का पालन किए बिना अनुभव प्रमाणपत्र जारी कर दिए। कहीं नियुक्ति तिथि से ही सेवा संपुष्ट दिखा दी गई, तो कहीं नियुक्ति के महज कुछ दिनों बाद ही सेवा संपुष्टि का प्रमाण पत्र बना दिया गया। इससे भी गंभीर मामला यह सामने आया कि कुछ संस्थानों ने कॉलेज के संबंधन से पहले की अवधि का भी अनुभव प्रमाणपत्र जारी कर दिया, जो नियमों की सीधी अनदेखी मानी जा रही है।
इन सभी पहलुओं को देखते हुए पटना हाईकोर्ट का यह आदेश केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे राज्य में सहायक प्राध्यापक नियुक्ति प्रक्रिया पर एक नजीर के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे फर्जी या संदिग्ध अनुभव प्रमाणपत्रों के आधार पर हुई नियुक्तियों की दोबारा जांच का रास्ता भी खुल सकता है।
इसी कड़ी में बीआरए बिहार विश्वविद्यालय से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला भी सामने आया है। राजनीति विज्ञान विषय में नियुक्ति से रोके गए छह अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच बुधवार को की गई। विश्वविद्यालय स्तर पर गठित कमेटी ने विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई चेकलिस्ट के आधार पर अनुभव प्रमाणपत्र सहित अन्य शैक्षणिक दस्तावेजों की गहन जांच की। इन अभ्यर्थियों पर दस्तावेजों में कमी और अन्य संदेह के आधार पर पदस्थापन रोका गया था।
कमेटी के सदस्यों ने अपनी जांच रिपोर्ट विश्वविद्यालय प्रशासन को सौंप दी है। सूत्रों के अनुसार, अभ्यर्थियों की ओर से अनुभव प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेजों से जुड़े साक्ष्य प्रस्तुत कर दिए गए हैं। अब अंतिम निर्णय विश्वविद्यालय प्रशासन को लेना है कि ये नियुक्तियां नियमों के अनुरूप मानी जाएंगी या नहीं।






















