बिहार विधानसभा के बजट सत्र (Bihar Budget Session) के पांचवें दिन सदन का माहौल उस वक्त तीखा हो गया जब पुलिस थानों की बदहाल बुनियादी सुविधाओं का मुद्दा केंद्र में आ गया। कार्यवाही की शुरुआत सवाल-जवाब से हुई, लेकिन चर्चा जल्द ही प्रशासनिक जवाबदेही और जमीनी हकीकत के टकराव में बदल गई। भाजपा विधायक जीवेश मिश्रा ने मरम्मत मद में आवंटित राशि और निर्माण कार्यों में हो रही देरी पर सवाल उठाते हुए सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा। उनका तर्क था कि जिस थाना भवन को न तो जर्जर माना गया है और न ही वह बहुत पुराना है, उसके लिए छह लाख रुपये की मरम्मत राशि जारी होना वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।
विधायक ने ब्लॉक स्तर पर कर्मियों के रहने की व्यवस्था न होने को व्यवस्था की एक बड़ी चूक बताया और कहा कि जिला स्तर पर जहां आवासीय प्रावधान मौजूद हैं, वहीं ब्लॉक स्तर पर पुलिसकर्मियों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है। थानेदारों के लिए आवास की कमी और जहां व्यवस्था है वहां भवनों की जर्जर हालत को उन्होंने पुलिस व्यवस्था की कार्यक्षमता से जोड़ा। उनका कहना था कि जिस ढांचे पर कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी टिकी है, वही ढांचा कमजोर होगा तो सेवा-प्रदाय की गुणवत्ता प्रभावित होना तय है।
सदन में चर्चा उस वक्त और गंभीर हो गई जब 2023 में महिला सिपाहियों के लिए बैरक निर्माण की प्रशासनिक स्वीकृति मिलने के बावजूद 2026 तक काम शुरू न होने का मुद्दा उठाया गया। इसी तरह आगंतुकों के लिए अलग कक्ष की स्वीकृति 2021 में होने के बाद भी निर्माण शुरू न होना योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करता है। विधायक ने यह सवाल उठाया कि वर्षों तक फाइलों में अटकी योजनाओं का जिम्मेदार कौन है और आखिर कब जमीनी स्तर पर बदलाव दिखेगा।
इस पर पुलिस विभाग के मंत्री सम्राट चौधरी ने मरम्मत मद में जारी राशि और निर्माण आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि विभागीय स्तर पर निर्देश दिए जा चुके हैं और यदि निचले स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। मंत्री के जवाब के बावजूद विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच बहस ने यह संकेत दिया कि समस्या केवल फंड जारी करने की नहीं बल्कि निगरानी और समयबद्ध क्रियान्वयन की भी है।






















