पटना। बिहार विधान मंडल के बजट सत्र (Bihar Budget Session) का 13वां दिन राजनीतिक गर्माहट और तीखे आरोप-प्रत्यारोप के बीच शुरू हुआ। सदन की कार्यवाही आरंभ होने से पहले ही विपक्षी दलों के विधायकों ने पोर्टिको में जोरदार प्रदर्शन कर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की, जिससे साफ संकेत मिला कि आगामी दिनों में बजट सत्र और अधिक टकरावपूर्ण होने वाला है। विपक्ष ने जहां मदरसा शिक्षकों की नियुक्ति और राज्य में कानून-व्यवस्था को मुद्दा बनाया, वहीं कटौती प्रस्ताव को लेकर मंत्री के बयान ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है।
सत्र की शुरुआत से पहले AIMIM के विधायक मदरसा शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर प्रदर्शन करते दिखे। उनका कहना है कि लंबे समय से लंबित मांगों को सरकार गंभीरता से नहीं ले रही, जिससे शिक्षकों और छात्रों दोनों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। दूसरी ओर राष्ट्रीय जनता दल के विधायकों ने राज्य में बिगड़ती कानून-व्यवस्था का मुद्दा उठाते हुए सरकार पर निशाना साधा और इसे प्रशासनिक विफलता बताया। इस दौरान पोर्टिको में जोरदार नारेबाजी से माहौल राजनीतिक रूप से काफी गर्म दिखाई दिया।
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सदन की कार्यवाही शुरू होते ही बहस का केंद्र कटौती प्रस्ताव बन गया। राजद विधायक सर्वजीत ने आरोप लगाया कि ग्रामीण विकास विभाग से जुड़े मंत्री का बयान लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि यदि कटौती प्रस्ताव लाने वाले विधायकों के क्षेत्रों में विकास कार्य रोकने की बात कही गई है, तो यह सदन की गरिमा के विपरीत है और मंत्री के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। सर्वजीत ने इसे विपक्ष को दबाने की कोशिश करार दिया और कहा कि इससे लोकतांत्रिक परंपराओं पर सवाल उठते हैं।
सरकार की ओर से जवाब देते हुए विजय चौधरी ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार सभी क्षेत्रों के विकास के लिए प्रतिबद्ध है और जनता ने उन्हें इसी भरोसे के साथ चुना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बातचीत के दौरान किसी प्रकार की गलतफहमी पैदा हो गई होगी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार किसी क्षेत्र के विकास में भेदभाव करेगी। उनके बयान से सरकार ने विवाद को शांत करने की कोशिश की, लेकिन विपक्ष ने इसे संतोषजनक नहीं माना।
दरअसल विवाद की शुरुआत बुधवार को ग्रामीण विकास मंत्री अशोक चौधरी के उस बयान से हुई जिसमें उन्होंने कटौती प्रस्ताव वापस लेने की चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाले विधायकों के क्षेत्रों में विभागीय काम प्रभावित हो सकते हैं। इस बयान ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी और विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दबाव बनाने की रणनीति बताया।






















