बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Chunav 2025) के पहले चरण की वोटिंग ने राज्य की सियासत का पूरा गणित बदल दिया है। इस बार बिहार ने मतदान के मामले में ऐसा इतिहास रचा है, जिसकी गूंज दिल्ली से लेकर देश के हर राजनीतिक गलियारे तक सुनाई दे रही है। चुनाव आयोग के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, पहले चरण में 64.66 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने वोट का प्रयोग किया — यह आंकड़ा बिहार के चुनावी इतिहास में अब तक का सबसे अधिक है।

1951 से अब तक के सारे रिकॉर्ड इस बार टूट गए। 1998 में जहां 64 फीसदी वोटिंग को सबसे ऊंचा रिकॉर्ड माना गया था, वहीं इस बार जनता ने उससे भी आगे बढ़कर लोकतंत्र के उत्सव में भागीदारी दिखाई। इस ऐतिहासिक मतदान से यह साफ संकेत मिल रहा है कि बिहार का मतदाता इस बार सिर्फ उत्साहित ही नहीं, बल्कि बदलाव या स्थायित्व – किसी एक दिशा में निर्णायक भूमिका निभाने के मूड में है।
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पहले चरण में कुल 121 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान हुआ। इन इलाकों में 3.75 करोड़ से अधिक मतदाताओं ने लोकतंत्र के इस पर्व में हिस्सा लिया। दिलचस्प बात यह है कि मतदान प्रतिशत के मामले में मुजफ्फरपुर और समस्तीपुर जैसे जिलों ने रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन किया। मुजफ्फरपुर में 70.96 प्रतिशत और समस्तीपुर में 70.63 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि मधेपुरा, वैशाली, सहरसा और खगड़िया ने भी 66-67 प्रतिशत के आसपास वोटिंग दर्ज की। पटना और नालंदा जैसे शहरी क्षेत्रों में हालांकि मतदान प्रतिशत थोड़ा कम रहा, फिर भी कुल आंकड़ा बताता है कि बिहार की जनता ने इस बार पूरी मजबूती के साथ अपनी राय दी है।
पिछले चुनावों पर नज़र डालें तो 2020 के कोरोना काल में हुए विधानसभा चुनावों में 57.29 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि 2015 में 56.91 प्रतिशत और 2010 में मात्र 52.73 प्रतिशत लोगों ने वोट डाला था। इस बार मतदान का आंकड़ा न सिर्फ़ पिछले सभी चुनावों से आगे है, बल्कि यह जनता की नई राजनीतिक ऊर्जा का संकेत भी देता है।

इतिहास गवाह है कि जब-जब बिहार में भारी मतदान हुआ है, तब सत्ता परिवर्तन की हवा भी तेज़ चली है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस ऐतिहासिक मतदान का नतीजा किसके पक्ष में जाता है — बदलाव की ओर या फिर स्थिरता के नाम पर वर्तमान सरकार की वापसी की ओर।






















