बिहार की राजनीति में मनरेगा (MNREGA Name Change) को लेकर एक बार फिर सियासी तापमान बढ़ गया है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के नाम में बदलाव के विरोध में बिहार कांग्रेस ने राजधानी पटना में शक्ति प्रदर्शन किया। सदाकत आश्रम से शुरू हुआ पैदल मार्च गांधी मैदान पहुंचा, जहां महात्मा गांधी की प्रतिमा के समक्ष कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ आवाज बुलंद की। इस मार्च के जरिए कांग्रेस ने यह संदेश देने की कोशिश की कि मनरेगा केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के गरीब और मजदूर वर्ग के जीवन की रीढ़ है।

बिहार कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम ने मार्च के दौरान केंद्र की भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि मनरेगा ऐसी योजना थी जिसने देश के करोड़ों मजदूरों को साल में 100 दिन के रोजगार की कानूनी गारंटी दी। उनका आरोप है कि मौजूदा सरकार ने न केवल इस योजना को कमजोर किया, बल्कि इसके मूल स्वरूप और आत्मा को भी खत्म करने का काम किया है। राजेश राम ने यह भी कहा कि महात्मा गांधी का नाम हटाना सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि उस विचारधारा पर चोट है जो गरीब, श्रमिक और गांव के सम्मान से जुड़ी हुई है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मनरेगा का नाम बदलकर जी राम जी योजना लागू करने की कोशिश गरीबों के अधिकारों को सीमित करने की दिशा में उठाया गया कदम है। पार्टी का तर्क है कि गांधी के नाम से जुड़ी इस योजना ने देश के सबसे पिछड़े इलाकों में रोजगार, पलायन पर रोक और सामाजिक सुरक्षा का भरोसा दिया था। नाम बदलने के साथ-साथ बजट और काम के दिनों में कटौती कर सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रही है।

इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की तैयारी भी शुरू हो चुकी है। कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में यह फैसला लिया गया है कि पांच जनवरी से देशभर में मनरेगा के नाम परिवर्तन के खिलाफ अभियान चलाया जाएगा। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ नाम की नहीं, बल्कि अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों की है। कांग्रेस ने सरकार को यह भी याद दिलाया कि जिस तरह किसानों के दबाव और विपक्षी एकजुटता के कारण तीन कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा था, उसी तरह मनरेगा के मामले में भी सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया जाएगा।






















