बिहार की राजनीति (Bihar Politics) में एक बार फिर बड़े बदलाव की आहट सुनाई देने लगी है। लंबे समय से अपने अस्तित्व और सियासी मजबूती के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस के भीतर अब यह बहस खुलकर सामने आ गई है कि क्या पार्टी को राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन जारी रखना चाहिए या फिर अपने दम पर चुनावी मैदान में उतरना चाहिए। दिल्ली में हुई कांग्रेस नेताओं की अहम बैठक ने इस बहस को सार्वजनिक मंच दे दिया है और इसके राजनीतिक निहितार्थ दूरगामी माने जा रहे हैं।
इस बैठक में कांग्रेस सांसद पप्पू यादव ने बिना किसी लाग-लपेट के साफ शब्दों में कहा कि अगर कांग्रेस को बिहार में खुद को मजबूत करना है तो उसे आरजेडी की छाया से बाहर निकलना होगा। उनके मुताबिक गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस का अपना एजेंडा और पहचान कमजोर पड़ती गई है, जिसका सीधा असर संगठन और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ा है। पप्पू यादव की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब बिहार में विपक्षी राजनीति नए सिरे से आकार ले रही है और हर पार्टी अपने भविष्य की रणनीति पर मंथन कर रही है।
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बैठक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी बिहार कांग्रेस को लेकर दो टूक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अब केवल दिल्ली से रणनीति बनाने का दौर खत्म हो चुका है और बिहार के नेताओं को खुद जिम्मेदारी उठानी होगी। राहुल गांधी के अनुसार जमीन पर मेहनत, संगठन को मजबूत करना और स्पष्ट रोडमैप तैयार करना ही कांग्रेस को दोबारा प्रासंगिक बना सकता है। उनका यह बयान इस ओर इशारा करता है कि पार्टी आलाकमान अब बिहार में नेतृत्व की भूमिका स्थानीय नेताओं को सौंपना चाहता है, लेकिन उसके साथ जवाबदेही भी तय करना जरूरी समझता है।
इसी कड़ी में वरिष्ठ नेता तारिक अनवर ने यह सवाल उठाया कि केवल जिम्मेदारी सौंप देना काफी नहीं है। उन्होंने कहा कि जब तक यह तय नहीं होगा कि कौन नेता किस काम के लिए जिम्मेदार है और उसके नतीजे क्या होंगे, तब तक संगठनात्मक सुधार संभव नहीं है। तारिक अनवर का यह बयान कांग्रेस के भीतर मौजूद उस चिंता को दर्शाता है, जिसमें बार-बार रणनीति बदलने के बावजूद जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं।
कांग्रेस-राजद गठबंधन को लेकर उठी इन अटकलों पर सत्तारूढ़ एनडीए के सहयोगी और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने जिस पार्टी के साथ गठबंधन किया था, उससे बिहार के अधिकांश लोग नफरत करते हैं और उसी वजह से कांग्रेस भी नकारात्मक छवि का शिकार हो गई। मांझी के अनुसार अगर कांग्रेस सच में इस रिश्ते से बाहर निकलने का फैसला करती है तो यह उसके लिए सही दिशा में उठाया गया कदम होगा।





















