Bihar Corruption News: बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के दावों के बीच एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। साल 2025 में राज्य में दर्ज भ्रष्टाचार के मामलों ने पिछले 25 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। बिहार सतर्कता अन्वेषण ब्यूरो की आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में कुल 122 भ्रष्टाचार के मामले दर्ज किए गए, जो न सिर्फ बीते सात वर्षों के औसत से कहीं ज्यादा हैं, बल्कि 25 साल के औसत आंकड़े से लगभग दोगुने हैं। यह वही साल है जब बिहार में 243 सीटों वाली विधानसभा के चुनाव भी हुए, जिससे इन आंकड़ों के राजनीतिक और प्रशासनिक मायने और गहरे हो जाते हैं।
सतर्कता ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 25 वर्षों में औसतन हर साल करीब 72 भ्रष्टाचार के मामले दर्ज होते रहे हैं, जबकि 2018 से 2024 के सात सालों में यह औसत और भी कम होकर करीब 50 मामलों तक सिमट गया था। इन सात वर्षों में 2022 सबसे अधिक मामलों वाला साल रहा, जब 72 एफआईआर दर्ज की गई थीं। इसके मुकाबले 2023 में महज 36 मामले सामने आए थे। 2018 और 2019 में क्रमशः 63 और 68 केस दर्ज हुए, जबकि 2020 में यह संख्या गिरकर 37 तक पहुंच गई थी। 2021 में थोड़ी बढ़ोतरी के साथ 58 मामले सामने आए। लेकिन 2025 में अचानक 122 मामलों का दर्ज होना साफ तौर पर बताता है कि या तो भ्रष्टाचार बढ़ा है या फिर निगरानी और कार्रवाई पहले से कहीं ज्यादा सख्त हुई है।
2025 में दर्ज हुए कुल मामलों में सबसे बड़ा हिस्सा रिश्वतखोरी के मामलों का रहा। ब्यूरो के मुताबिक इस साल दर्ज भ्रष्टाचार के मामलों में करीब 81 प्रतिशत सिर्फ रिश्वत से जुड़े थे। 2025 में कुल 101 रिश्वतखोरी के केस दर्ज किए गए, जो 25 साल के औसत 47 मामलों से दोगुने और 2018 से 2024 के बीच के औसत 35 मामलों से लगभग तीन गुना हैं। यह आंकड़ा बताता है कि निचले और मध्य स्तर के प्रशासन में रिश्वत की समस्या कितनी गहरी जड़ें जमा चुकी है।
इन मामलों में कार्रवाई के दौरान ट्रैप ऑपरेशन के जरिए 107 आरोपियों को रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया। इनमें सात महिलाएं और छह गैर-सरकारी कर्मचारी भी शामिल थे, जो यह संकेत देता है कि भ्रष्टाचार की जद सिर्फ सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं रह गई है। इन ऑपरेशनों में कुल 37.80 लाख रुपये की रिश्वत राशि बरामद की गई, जिसमें एक ही मामले में सबसे बड़ी बरामदगी तीन लाख रुपये की रही।
सिर्फ मामले दर्ज करने तक ही कार्रवाई सीमित नहीं रही। 2025 में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में सजा के आंकड़ों में भी तेज उछाल देखने को मिला। इस साल कुल 29 मामलों में फैसले सुनाए गए, जिनमें से 28 फैसले पटना की सतर्कता अदालत ने दिए। इसकी तुलना अगर 2024 से की जाए तो उस साल सिर्फ 18 मामलों में सजा सुनाई गई थी। 25 वर्षों का औसत देखें तो हर साल महज 5 से 6 मामलों में ही दोष सिद्ध हो पाता था। इस लिहाज से 2025 को सजा के मामलों में भी एक असाधारण साल माना जा रहा है।
हालांकि इन आंकड़ों के बीच एक कड़वी सच्चाई भी सामने आई है। सतर्कता ब्यूरो के मुताबिक भ्रष्टाचार के मामलों के निपटारे में औसतन 13 साल का समय लग रहा है। यानी एक मामला दर्ज होने से लेकर अंतिम फैसले तक पहुंचने में एक दशक से भी ज्यादा वक्त लग जाता है। यह लंबा इंतजार न सिर्फ न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की गति को भी कमजोर करता है।
इस स्थिति को देखते हुए सतर्कता अन्वेषण ब्यूरो ने आने वाले सालों में प्रक्रिया को तेज करने की तैयारी शुरू कर दी है। ब्यूरो के महानिदेशक जितेंद्र सिंह गंगवार के मुताबिक 2026 से दो विशेष सेल बनाए जाएंगे। एक सेल चार्जशीट दाखिल होने से लेकर सुनवाई और फैसले तक पूरे कानूनी प्रोसेस की निगरानी करेगा, जबकि दूसरा सेल सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी को समय पर हासिल करने पर काम करेगा। इसके अलावा जांच को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए अत्याधुनिक तकनीक से लैस एक अलग टेक्नोलॉजी विंग बनाने की भी योजना है।
2025 में रिश्वतखोरी के साथ-साथ आय से अधिक संपत्ति के मामलों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। इस साल 15 डिसप्रोपोर्शनट एसेट यानी डीए के केस दर्ज किए गए, जबकि 25 साल का औसत महज आठ मामलों का रहा है। इन मामलों में आरोप है कि संबंधित अधिकारियों ने अपनी ज्ञात आय से करीब 12.77 करोड़ रुपये ज्यादा की संपत्ति जुटाई। इनमें सबसे बड़ा मामला भवन निर्माण विभाग के एक पूर्व कार्यपालक अभियंता से जुड़ा है, जिस पर 2.17 करोड़ रुपये की अनुपातहीन संपत्ति रखने का आरोप है।
इसके अलावा 2025 में पद के दुरुपयोग और अधिकारों के गलत इस्तेमाल से जुड़े छह मामले भी दर्ज किए गए। इन मामलों में गेहूं खरीद में गड़बड़ी, जमीन की अवैध रजिस्ट्री, ग्रामीण विकास योजनाओं में लाभार्थियों की राशि का दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। हालांकि यह संख्या कुल मामलों का करीब पांच प्रतिशत ही है, लेकिन सतर्कता ब्यूरो का दावा है कि उसने ऐसे 121 मामलों की जांच पूरी की है, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे ज्यादा है।
ब्यूरो की रिपोर्ट यह भी बताती है कि बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम 2009 के तहत दिसंबर 2025 तक कुल 232 भ्रष्टाचार के मामलों में संपत्ति जब्ती या कुर्की की प्रक्रिया चल रही है। इनमें कई मामले एक दशक से भी पुराने हैं और इनमें पंचायती राज संस्थाओं, न्यायिक सेवाओं और कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े अधिकारी शामिल हैं। इसके साथ ही 2006 से 2015 के बीच शिक्षक नियुक्ति में कथित अनियमितताओं को लेकर भी कार्रवाई जारी है, जिसमें पटना हाईकोर्ट के निर्देश पर पूरे बिहार में 1711 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं।






















