बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद (Bihar Dharmik Nyas Parishad) अब पारंपरिक प्रशासनिक दायरे से आगे बढ़कर सामाजिक परिवर्तन की एक संगठित शक्ति के रूप में सामने आ रहा है। मठों और मंदिरों के प्रबंधन तक सीमित रहने के बजाय पर्षद ने शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, सांस्कृतिक जागरूकता और सामाजिक समरसता को अपने कार्यक्षेत्र का केंद्रीय हिस्सा बना लिया है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि राज्य में धार्मिक संस्थानों को योजनाबद्ध तरीके से समाज विकास के सक्रिय केंद्रों में बदला जा रहा है।
इस नई सोच की झलक 18 सितंबर को पटना के बापू सभागार में आयोजित राज्यस्तरीय धार्मिक न्यास समागम में स्पष्ट रूप से दिखाई दी। पर्षद से जुड़े चार हजार से अधिक मठों और मंदिरों के प्रतिनिधि, संत और प्रशासनिक अधिकारी एक मंच पर एकत्र हुए। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा माता सीता धाम की अवधारणा को मूर्त रूप देने से प्रेरित होकर पर्षद ने पहली बार धार्मिक ढांचे को सामाजिक विकास से जोड़ने का ठोस खाका पेश किया।
पर्षद अध्यक्ष प्रो. रणबीर नंदन के नेतृत्व में यह स्पष्ट किया गया कि मंदिर और मठ अब केवल पूजा-अर्चना के स्थल नहीं रहेंगे। उन्हें शिक्षा और समाज सुधार के केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। इसी उद्देश्य से स्वाध्याय केंद्र, पुस्तकालय और नि:शुल्क कोचिंग व्यवस्था की योजना बनाई गई है। संस्कृत पाठशालाओं और वेद अध्ययन को बढ़ावा देकर पारंपरिक ज्ञान को नई पीढ़ी से जोड़ने की दिशा में भी काम शुरू किया गया है।
स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार को भी प्राथमिकता दी गई है। मंदिर परिसरों में नि:शुल्क स्वास्थ्य शिविर, योग और आयुर्वेद केंद्र स्थापित करने की योजना तैयार है। महिलाओं और युवाओं के लिए कौशल प्रशिक्षण, कंप्यूटर शिक्षा और स्वरोजगार कार्यक्रम चलाकर आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन दिया जाएगा। दहेज रहित विवाह, जरूरतमंद कन्याओं के विवाह सहयोग और नशामुक्ति अभियान को सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में अपनाया गया है।
स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी पर्षद ने स्पष्ट लक्ष्य तय किए हैं। मंदिरों और मठों के आसपास के क्षेत्रों को स्वच्छ और प्लास्टिक मुक्त बनाने का अभियान चलाया जा रहा है। औषधीय पौधों की नर्सरी, गौशाला विकास और धर्मशाला विस्तार जैसी योजनाएं इस व्यापक सोच का हिस्सा हैं। पर्षद ने यह भी स्पष्ट किया है कि चढ़ावे की राशि को समाज कल्याण और विकास कार्यक्रमों से जोड़ा जाएगा।
छठ महापर्व के दौरान पर्षद की सक्रियता ने इस दृष्टिकोण को व्यवहार में भी दिखाया। राज्यभर के मंदिरों में सफाई अभियान चलाए गए, श्रद्धालुओं के लिए पेयजल और प्रसाद केंद्र बनाए गए और व्रती महिलाओं के लिए विश्राम व्यवस्था की गई। दिल्ली, मुंबई, सूरत और कोलकाता स्थित बिहारियों के मंदिरों को भी सेवा अभियान से जोड़कर पर्षद ने अपनी पहुंच का विस्तार किया।
सांस्कृतिक जागरूकता को संस्थागत रूप देने की दिशा में संतों और राष्ट्रीय विभूतियों की जयंती मनाने की परंपरा शुरू की गई है। अटल बिहारी वाजपेयी जयंती को प्रखरता दिवस, स्वामी विवेकानंद जयंती को आध्यात्मिक दिवस और संत रविदास जयंती को राज्यव्यापी कार्यक्रम के रूप में मनाया जा रहा है। इसी क्रम में संत रविदास जयंती का आयोजन 1 फरवरी को पटना के रवींद्र भवन में किया गया, जहां सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना का संदेश प्रमुख रूप से सामने रखा गया।
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के माध्यम से ऐतिहासिक चेतना को भी समाज से जोड़ने की पहल की गई है। सभी शिवालयों में विशेष पूजा-अर्चना का आह्वान करते हुए सोमनाथ मंदिर के संघर्ष और पुनर्निर्माण की गाथा को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
भविष्य की योजनाओं में “तीर्थ भवन” की स्थापना और प्रमुख तीर्थ स्थलों पर सामाजिक सेवा केंद्रों का निर्माण शामिल है। इन केंद्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, करियर मार्गदर्शन और महिला प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने की तैयारी है। पायलट परियोजनाओं के सफल होने के बाद इसे राज्यभर में विस्तारित करने की योजना है।
इन पहलों से स्पष्ट है कि बिहार में धार्मिक स्थल अब केवल आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि सेवा, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के सशक्त मंच के रूप में विकसित हो रहे हैं। परंपरा और आधुनिक विकास को साथ लेकर चलने की यह रणनीति राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक दिशा को नई ऊर्जा देने की क्षमता रखती है।






















