बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Election 1985) में व्यापक हिंसा के बीच कांग्रेस ने शानदार जीत दर्ज की और 196 सीटें जीतकर सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ले ली। इस चुनाव ने राज्य में सामाजिक और जातीय गोलबंदी के एक नए दौर की शुरुआत की।
चुनाव से पहले हिंसा का दौर
बिक्रमगंज, सीतामढ़ी, दलसिंहसराय, मोतिहारी, बेतिया सहित कई इलाकों में हुई हिंसक घटनाओं ने चुनावी माहौल को प्रभावित किया। मसौढ़ी, हटिया और नालंदा में प्रत्याशियों की हत्या कर दी गई। कांग्रेस प्रत्याशी जनेश्वर प्रसाद सिंह की उनके कार्यालय में हत्या कर दी गई। हटिया में निर्दलीय प्रत्याशी विष्णु महतो और नालंदा के निर्दलीय प्रत्याशी महेंद्र प्रसाद की भी हत्या कर दी गई। बोकारो के निर्दलीय प्रत्याशी बनवारी राम की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।
पारा मिलिट्री की 200 कंपनियां तैनात
चुनाव आयोग ने चुनाव को शांतिपूर्ण कराने के लिए पारा मिलिट्री की 200 कंपनियां तैनात की थीं। आयोग के सचिव आर. पी. भल्ला चुनाव के दौरान पटना में कैंप कर रहे थे। बिहार पुलिस और होमगार्ड को भी सुरक्षा व्यवस्था के लिए लगाया गया था। हर बूथ पर स्थायी पुलिस बल तैनात किया गया था।
चुनावी हिंसा में 69 लोगों की मौत
1985 के चुनाव में हुई हिंसा में 69 लोगों की जान गई। कुल 1370 हिंसक घटनाएं हुईं, जिनमें से चुनाव के दिन 310 घटनाएं सामने आईं और 49 लोगों की मौत हुई। बूथ लूट की कई घटनाएं भी हुईं। चुनाव के दिन करीब एक हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया।
कांग्रेस की जबरदस्त जीत
इस चुनाव में कांग्रेस ने 196 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा को केवल 16 सीटें मिलीं। कांग्रेस ने 323 प्रत्याशी उतारे थे, जबकि भाजपा ने 234 उम्मीदवार मैदान में उतारे। लोकदल 46 सीटों के साथ सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरा। जनता पार्टी ने 229 प्रत्याशी उतारे, जिनमें से 13 जीते। भाकपा के 167 प्रत्याशियों में 12 और माकपा के 44 प्रत्याशियों में से केवल एक को जीत मिली। आईपीएफ के 85 प्रत्याशी मैदान में थे, लेकिन कोई भी जीत हासिल नहीं कर सका। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने 57 सीटों पर चुनाव लड़ा और 9 सीटें जीतने में सफल रहा।
1980 के बिहार विधानसभा चुनाव: कांग्रेस की करारी हार और वापसी की कहानी
चुनाव के बाद कांग्रेस के बिंदेश्वरी दुबे 1985 से 1988 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। लेकिन इसके बाद बिहार में अस्थिरता का दौर शुरू हो गया। 1988 से 1989 तक भागवत झा आज़ाद मुख्यमंत्री बने, फिर कुछ महीनों के लिए सत्येंद्र नारायण सिन्हा को यह पद मिला। इसके बाद जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार भी लंबे समय तक नहीं चल सकी।
1985 के चुनावों ने कांग्रेस को भले ही प्रचंड बहुमत दिलाया, लेकिन एक कार्यकाल में चार मुख्यमंत्री बदलने से यह साफ हो गया कि बिहार में राजनीतिक स्थिरता की कमी थी। यह दौर 1990 के चुनावों के बाद जाकर खत्म हुआ, जब जनता दल के नेतृत्व में एक स्थिर सरकार बनी।






















