बिहार चुनाव (Bihar Election 2025) के नतीजों ने राज्य की मुस्लिम सियासत में एक नए दौर की शुरुआत का संकेत दे दिया है। ओवैसी की पार्टी AIMIM ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि महागठबंधन से उसका एलायंस हो जाए, लेकिन तेजस्वी यादव ने इस ओर जरा भी ध्यान नहीं दिया। और AIMIM का प्रदर्शन बता रहा है कि तेजस्वी यादव ने बड़ी गलती कर दी है। दशकों से राजद के पारंपरिक ‘माई समीकरण’ पर भरोसा करती आई मुस्लिम बिरादरी ने इस बार राजनीतिक ठिकाना बदलते हुए बड़े पैमाने पर AIMIM के पक्ष में मतदान किया है। महागठबंधन से दूरी और ओवैसी की पार्टी पर विश्वास के इस बड़े राजनीतिक स्थानांतरण ने न केवल मुस्लिम नेतृत्व की नई दिशा तय की है, बल्कि बिहार की सत्ता समीकरणों को भी झकझोर दिया है।
इस बदलाव की सबसे बड़ी झलक सीमांचल में देखने को मिली, जहाँ AIMIM ने न सिर्फ अपनी पुरानी पांचों सीटों—बायसी, अमौर, जोकीहाट, बहादुरगंज और कोचाधामन—को मजबूती से बचाया, बल्कि कई अन्य मुस्लिम बहुल इलाकों में वोटों का ऐसा ध्रुवीकरण दिखाया, जिसने महागठबंधन को निर्णायक क्षति पहुँचाई। बलरामपुर, दरभंगा ग्रामीण, गौराबौरम, प्राणपुर, कसबा, ठाकुरगंज और शेरघाटी जैसी सीटों पर AIMIM के उम्मीदवार दूसरे और तीसरे स्थान पर रहकर भी इतना मजबूत प्रदर्शन कर गए कि विपक्षी गठबंधन को जीत का रास्ता ही नहीं मिला।
सबसे बड़ी और राजनीतिक दृष्टि से प्रतीकात्मक जीत अमौर सीट पर देखने को मिली, जहाँ AIMIM प्रदेश अध्यक्ष अख्तरूल ईमान ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 38,983 वोटों के अभूतपूर्व अंतर से पराजित कर दिया। ईमान ने 1,00,756 वोट हासिल किए, जबकि NDA के सबा जफर को 61,863 और कांग्रेस के जलील मस्तान को महज़ 52,768 वोट मिले। अमौर के लगभग 70% मुस्लिम वोटर्स ने जिस उत्साह से मतदान किया, उसने यह साबित कर दिया कि AIMIM ने सीमांचल में एक स्थायी सामाजिक-राजनीतिक आधार खड़ा कर लिया है।
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यह नतीजे महागठबंधन के लिए कई मायनों में चेतावनी हैं। पिछले तीन दशकों से मुस्लिम समाज राजद-कांग्रेस को अपना स्वाभाविक राजनीतिक घर मानता रहा, लेकिन इस बार स्थिति उलटती दिखी। 18% मुस्लिम जनसंख्या वाले बिहार में इस बार सिर्फ 11 मुस्लिम विधायक जीतकर आए—पिछली विधानसभा के 19 की तुलना में यह बड़ी गिरावट है। इनमें से AIMIM के पाँच विधायक शामिल हैं, जो अकेले ही महागठबंधन के कुल मुस्लिम विधायकों (राजद 3, कांग्रेस 2) के बराबर ताकत रखते हैं।
एआईएमआईएम के उभार का एक बड़ा कारण महागठबंधन द्वारा मुस्लिम समुदाय को उपमुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार न देना भी माना जा रहा है। यह मुद्दा चुनाव प्रचार के दौरान खासा चर्चा में रहा और सीमांचल में इसका स्पष्ट असर देखने को मिला। कई सीटों पर AIMIM उम्मीदवारों को 10,000 से लेकर 1 लाख तक वोट मिले, जो पिछले चुनाव की तुलना में कई गुना अधिक है। बीते चुनाव में जहां AIMIM के अन्य उम्मीदवार औसतन 2-3 हजार वोट लेते थे, वहीं इस बार यह वोट बैंक सीधे महागठबंधन के खिलाफ खड़ा दिखाई दिया।
AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने भी नतीजों के बाद इसी राजनीतिक बदलाव की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि सीमांचल की जनता ने AIMIM पर भरोसा कर यह साबित कर दिया कि महागठबंधन का घमंड और चुनावी रणनीति की कमी ही उसकी हार का असली कारण है।





















