Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव का दूसरा चरण नजदीक आ रहा है और सभी की निगाहें ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण चंपारण क्षेत्र पर टिकी हैं। पूर्वी और पश्चिमी चंपारण की कुल 21 सीटों ने पिछले चुनाव में एनडीए को 17 सीटें देकर सत्ता पाने का रास्ता साफ किया था। इस बार भी यही क्षेत्र सत्ता का गणित तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाने जा रहा है। हालांकि, टिकट बंटवारे को लेकर उभरा असंतोष और प्रशांत किशोर के जन सुराज के प्रभाव ने इस बार चुनावी समीकरणों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है।
पश्चिम चंपारण की पहली विधानसभा सीट वाल्मीकिनगर में जदयू ने एक बार फिर धीरेंद्र प्रताप सिंह पर दांव लगाया है, जबकि कांग्रेस ने सुरेंद्र कुशवाहा को मैदान में उतारा है। थारू आदिवासियों, कुशवाहा, कोइरी, यादव और सहनी समाज के प्रभाव वाली इस सीट पर थारू वोटों को लेकर सबसे ज्यादा जोर-आजमाइश देखने को मिल रही है। वहीं रामनगर सुरक्षित सीट पर भाजपा ने भागीरथी देवी का टिकट काटकर नंद किशोर राम को उम्मीदवार बनाया है, जिससे पार्टी के भीतर ही असंतोष की लहर दौड़ गई है। इस सीट पर राजद के सुबोध पासवान और जनसुराज के पप्पू कुमार रंजन भी दावेदारी पेश कर रहे हैं।
पूर्वी चंपारण की आठ सीटों पर इस समय भाजपा के विधायक हैं, लेकिन इस बार हर सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय और अप्रत्याशित हो गया है। रक्सौल में भाजपा के प्रमोद कुमार सिन्हा के सामने कांग्रेस के पूर्व मंत्री श्याम बिहारी प्रसाद और जन सुराज से जदयू के पूर्व जिलाध्यक्ष भुवन पटेल मैदान में हैं।
केसरिया सीट पर जदयू की शालिनी मिश्रा और वीआईपी के वरुण विजय के बीच सीधा मुकाबला है, लेकिन जन सुराज के नाज अहमद खां उर्फ पप्पू खां ने इस समीकरण को पूरी तरह से बदल दिया है। मोतिहारी सीट पर भाजपा के प्रमोद कुमार, राजद की देवा गुप्ता और जन सुराज के डॉ. अतुल कुमार के बीच मुकाबला काफी दिलचस्प बन गया है।
चिरैया सीट पर भाजपा के लालबाबू प्रसाद गुप्ता, राजद के लक्ष्मी नारायण प्रसाद यादव और जनसुराज के संजय सिंह के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है। इसके अलावा अच्छेलाल प्रसाद के राजद से बागी होकर चुनाव लड़ने ने इस सीट के समीकरण को और भी जटिल बना दिया है। मधुबन सीट पर भाजपा के पूर्व मंत्री राणा रणधीर, राजद की संध्या रानी और जन सुराज के विजय कुमार कुशवाहा के बीच कड़ा मुकाबला है।
चंपारण के कुल 21 विधानसभा क्षेत्रों में इस बार जातिगत समीकरणों के साथ-साथ विकास के मुद्दे भी चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बने हुए हैं। एनडीए अपने किले को बचाने की कोशिश में है, तो महागठबंधन और जन सुराज इन सीटों पर अपनी जड़ें मजबूत करने में लगे हैं। ऐसे में 11 नवंबर को होने वाले मतदान के बाद ही साफ हो पाएगा कि चंपारण की हवा ने सत्ता के गणित को किस तरफ मोड़ा है।






















