बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Election 2025) के नतीजे इस बार कई मायनों में ऐतिहासिक रहे हैं। 243 में से 202 सीटों पर जीत दर्ज करके एनडीए ने न केवल प्रचंड बहुमत हासिल किया, बल्कि 2010 के बाद अपना सबसे मजबूत प्रदर्शन भी किया है। भाजपा पहली बार बिहार चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है, जबकि जदयू ने अपनी सीटों में उल्लेखनीय सुधार दिखाते हुए सत्ता समीकरण में खुद की प्रासंगिकता मजबूती से साबित की है। लेकिन इन आंकड़ों के बीच अब सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल उभरकर सामने आ रहा है—आखिर बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा?
बिहार में चुनाव की घोषणा से पहले से ही सीएम फेस को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं। भाजपा की बढ़ी हुई ताकत को देखते हुए यह चर्चा तेज थी कि क्या पार्टी किसी नए चेहरे को आगे ला सकती है। हालांकि नतीजों के बाद समीकरण कुछ और ही कहानी बयां करते दिख रहे हैं। भाजपा ने 101 में से लगभग 89 सीटें जीतकर 89% का रिकॉर्ड स्ट्राइक रेट हासिल किया है। वहीं, 2020 के मुकाबले बेहद कमजोर स्थिति से जदयू ने इस बार मजबूत वापसी करते हुए 84 सीटें जीत लीं।
इन नतीजों से यह साफ झलकता है कि भले ही भाजपा संख्या में आगे हो, लेकिन जब बात मुख्यमंत्री के चेहरे की आती है तो एनडीए खेमे में नीतीश कुमार का कोई विकल्प फिलहाल मौजूद नहीं दिखता। यही वजह है कि एनडीए के शीर्ष नेताओं के बयानों में मुख्यमंत्री पद को लेकर एक तरह की स्पष्टता दिखाई देने लगी है।
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जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद संजय कुमार झा ने इस जनादेश को “बिहार की पुनर्स्थापना के लिए स्वर्ण क्षण” बताते हुए यह संकेत दिया कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही आने वाले पांच सालों का विकास खाका तैयार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि युवाओं के लिए 1 करोड़ नौकरियों का वादा, उद्योग लगाने के लिए प्रधानमंत्री का आह्वान और बिहार को शीर्ष 10 राज्यों में शामिल करने की आकांक्षा—इन सबको मूर्त रूप देने के लिए नीतीश कुमार जैसा अनुभवी नेतृत्व जरूरी है।
इधर, एनडीए सहयोगी दलों की ओर से भी लगातार एक ही संदेश दिया जा रहा है कि मुख्यमंत्री वही होंगे, जिन्होंने पिछले 20 वर्षों में बिहार के विकास की बुनियाद तैयार की है। आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने मतगणना के दौरान ही यह कहकर तस्वीर को और स्पष्ट कर दिया कि बिहार को नीतीश कुमार के नेतृत्व की अभी भी आवश्यकता है।






















