Bihar Health Education Model: बिहार आज ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां राज्य का सामाजिक स्वास्थ्य और आर्थिक भविष्य एक-दूसरे से अलग नहीं रह गए हैं। जिस जनसंख्या को बिहार की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है, वही अगर कमजोर स्वास्थ्य संकेतकों के साथ आगे बढ़े तो विकास की रफ्तार थम जाती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़े इस सच्चाई की ओर साफ इशारा करते हैं। राज्य में बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषण, स्टंटिंग और वेस्टिंग जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिसका सीधा असर उनके शारीरिक ही नहीं, मानसिक और बौद्धिक विकास पर भी पड़ता है। मातृ मृत्यु दर और रोकी जा सकने वाली बीमारियाँ आज भी हजारों परिवारों को आर्थिक रूप से कमजोर बना रही हैं।
यूनेस्को चेयर ऑन ग्लोबल हेल्थ एंड एजुकेशन के लिए भारत के राष्ट्रीय प्रतिनिधि और तरंग हेल्थ एलायंस के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. राहुल मेहरा का मानना है कि इन जटिल समस्याओं का समाधान किसी महंगे अस्पताल या बड़े बजट वाले कार्यक्रम में नहीं, बल्कि स्कूल की कक्षा में छिपा है। उनके अनुसार यदि बिहार को अपनी जनसांख्यिकीय क्षमता को वास्तविक आर्थिक लाभ में बदलना है तो स्वास्थ्य शिक्षा को बचपन से ही शिक्षा प्रणाली का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा। यह न केवल जनस्वास्थ्य सुधारने का माध्यम है, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक विकास की सबसे किफायती रणनीतियों में से एक भी है।
डॉ. मेहरा ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि बिहार के पास एक ऐसा सशक्त ढांचा पहले से मौजूद है, जिसका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। राज्य के हजारों सरकारी स्कूल रोज़ लाखों बच्चों तक पहुंच रखते हैं। यही स्कूल स्वच्छता, पोषण, मानसिक स्वास्थ्य और बीमारी से बचाव जैसे व्यवहारों को सिखाने का सबसे प्रभावी मंच बन सकते हैं। हाथ धोने, संतुलित आहार, स्वच्छता और प्राथमिक स्वास्थ्य जानकारी जैसी बातें किसी बड़े निवेश की मांग नहीं करतीं, लेकिन इनका असर पीढ़ियों तक दिखाई देता है। एक ग्रामीण परिवार जो मामूली बीमारी के इलाज में हजारों रुपये खर्च कर देता है, वही खर्च कुछ बुनियादी जानकारी से रोका जा सकता है। बीमारी पर खर्च हुआ पैसा शिक्षा, पोषण या छोटे व्यवसायों में लग सकता था, लेकिन जानकारी के अभाव में परिवार कर्ज के चक्र में फंस जाता है।
स्वास्थ्य शिक्षा का प्रभाव केवल एक बच्चे तक सीमित नहीं रहता। स्कूल में सीखी गई बातें बच्चे घर तक लेकर जाते हैं और धीरे-धीरे पूरे परिवार के व्यवहार को प्रभावित करती हैं। स्वच्छता और पोषण की समझ रखने वाला बच्चा अपने घर में भोजन और स्वास्थ्य से जुड़े फैसलों को बदल सकता है। ओआरएस या प्राथमिक उपचार की जानकारी किसी भाई या बहन की जान बचा सकती है। बचपन में अपनाई गई आदतें जीवन भर साथ रहती हैं और यही आदतें भविष्य के कार्यबल को अधिक उत्पादक बनाती हैं।
बिहार में आयुष्मान भारत स्कूल हेल्थ एंड वेलनेस प्रोग्राम जैसी योजनाएँ मौजूद हैं, जो कागजों पर सकारात्मक दिखती हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर इनकी सीमाएँ भी साफ दिखाई देती हैं। कार्यक्रम का अत्यधिक निर्भर होना शिक्षकों की स्वैच्छिक भागीदारी पर, पहले से दबाव में चल रही शिक्षा व्यवस्था में व्यावहारिक नहीं लगता। साल भर में सीमित समय और सफलता को केवल गतिविधियों की संख्या से मापना, वास्तविक व्यवहार परिवर्तन को नजरअंदाज कर देता है। परिणाम यह होता है कि रिपोर्ट तो अच्छी बन जाती है, लेकिन बच्चों का स्वास्थ्य जस का तस बना रहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार को अब एक अलग और अधिक ठोस मॉडल अपनाने की जरूरत है। ऐसा स्कूल स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम जो राज्य की जरूरतों के अनुसार डिजाइन हो, जिसमें स्वास्थ्य शिक्षा एक अनिवार्य विषय हो, शिक्षकों को इसके लिए प्रशिक्षण और पारिश्रमिक मिले और पूरे शैक्षणिक वर्ष में पर्याप्त समय दिया जाए। सबसे अहम बात यह है कि कार्यक्रम की सफलता का आकलन बच्चों के व्यवहार और स्वास्थ्य परिणामों से किया जाए, न कि केवल औपचारिक आंकड़ों से।
डॉ. मेहरा के नेतृत्व में तरंग हेल्थ एलायंस ने दिल्ली, हरियाणा और जयपुर में ऐसे ही मॉडल को सफलतापूर्वक लागू कर दिखाया है। हरियाणा सरकार के साथ समझौते के तहत सरकारी स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा को औपचारिक विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है। पाठ्यपुस्तकों, प्रशिक्षित शिक्षकों और अभिभावकों की भागीदारी के साथ लागू इस मॉडल से छात्रों के स्वास्थ्य व्यवहार में ठोस और मापनीय सुधार देखने को मिले हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार का आर्थिक कायाकल्प स्वस्थ आबादी के बिना संभव नहीं है। उद्योग, कृषि या इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश तभी सार्थक होगा जब कार्यबल शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम होगा। स्कूल आधारित स्वास्थ्य शिक्षा बिहार के लिए वही रास्ता दिखाती है, जो कम लागत में बड़े बदलाव की क्षमता रखता है। यह केवल स्वास्थ्य सुधार का उपाय नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की बुनियाद है।
















