बिहार में हिजाब विवाद (Bihar Hijab Controversy) अभी शांत नहीं हुआ है. चयनित आयुष महिला डॉक्टर नुसरत परवीन ने अब तक अपनी नियुक्ति पर ज्वाइन नहीं किया है, जबकि अंतिम तिथि 31 दिसंबर तय की गई है. इस बीच पटना के सिविल सर्जन डॉक्टर अविनाश सिंह का दो टूक बयान सामने आया है कि अगर तय समय तक ज्वाइनिंग नहीं होती है तो उसके बाद किसी भी तरह की प्रक्रिया संभव नहीं होगी और मौका हाथ से निकल जाएगा.
नुसरत परवीन की ओर से अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि वह ज्वाइनिंग करेंगी या नहीं. यही अनिश्चितता पूरे मामले को और संवेदनशील बना रही है. एक ओर व्यक्तिगत आस्था और पहनावे को लेकर बहस है, तो दूसरी ओर सरकारी नियमों की समय-सीमा, जिसे प्रशासन किसी भी हाल में बढ़ाने के मूड में नहीं दिख रहा है.
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इसी बीच पटना के गर्दनीबाग में आयुष डॉक्टरों का बड़ा धरना प्रदर्शन चल रहा है. बैनर और पोस्टर के साथ बड़ी संख्या में जुटे चिकित्सक सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं और अपनी नियुक्ति की मांग दोहरा रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि प्रदर्शनकारी डॉक्टरों ने नुसरत परवीन के मामले पर भी खुलकर राय रखी. उनका कहना है कि चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद किसी भी डॉक्टर को ज्वाइनिंग से पीछे नहीं हटना चाहिए, क्योंकि इसका सीधा असर पहले से जूझ रही स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ता है.
धरने में शामिल आयुष चिकित्सकों ने बताया कि सितंबर 2013 के बाद लगभग 13 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद यह बहाली प्रक्रिया शुरू हुई थी. कुल 2619 पदों का विज्ञापन निकाला गया, लेकिन मौजूदा चयन प्रक्रिया के बाद केवल 1283 उम्मीदवारों को ही नियुक्ति का मौका मिला. इसके बावजूद 1336 से अधिक पद अब भी खाली हैं. डॉक्टरों का तर्क है कि कटऑफ सरकारी नियमों और न्यायालय के निर्देशों के अनुसार तय किया गया है और वे उसका सम्मान करते हैं, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर पदों का खाली रह जाना एक असाधारण स्थिति है, जिस पर सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए.
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प्रदर्शनकारी डॉक्टरों का कहना है कि आयुष चिकित्सकों की नियुक्ति ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और हेल्थ सेंटरों में होती है. इन पदों के खाली रहने से ग्रामीण और गरीब आबादी को बुनियादी इलाज तक नहीं मिल पा रहा है. बिहार पहले से ही डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है और ऐसे में चयनित उम्मीदवारों का ज्वाइन न करना या सरकार का पदों को खाली छोड़ देना, दोनों ही स्थितियां जनहित के खिलाफ हैं. डॉक्टरों ने सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि विज्ञापित पदों को खाली नहीं छोड़ा जाना चाहिए, खासकर जब मामला सीधे जनस्वास्थ्य से जुड़ा हो.
धरने में शामिल डॉक्टरों ने यह भी कहा कि जिन 1283 उम्मीदवारों का चयन हुआ है, उनमें नुसरत परवीन भी शामिल हैं और उन्हें बिना किसी डर के नौकरी ज्वाइन करनी चाहिए. उनका मानना है कि पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक तौर पर गलत तरीके से पेश किया गया है और इसे बेवजह तूल दिया गया. प्रदर्शनकारी चिकित्सकों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार को इस पूरे मामले में संवेदनशीलता और संतुलन दिखाना चाहिए.
खासतौर पर अल्पसंख्यक समाज से आने वाली महिला डॉक्टरों ने नुसरत परवीन से अपील की कि उन्होंने मेहनत और पढ़ाई के दम पर यह मुकाम हासिल किया है, इसलिए पीछे हटने का कोई कारण नहीं है. उनका कहना है कि जो हो चुका है, उस पर बार-बार चर्चा करने से बेहतर है कि आगे बढ़कर मरीजों की सेवा की जाए.






















