Bihar Blanket Distribution: बिहार में कड़ाके की ठंड अब बीतने की कगार पर है, लेकिन इस मौसम ने सरकार की संवेदनशीलता पर ऐसे सवाल छोड़ दिए हैं, जिनके जवाब अब तक नहीं मिले हैं। दिसंबर से लेकर जनवरी के तीसरे हफ्ते तक जब रात का तापमान 5 डिग्री सेल्सियस से नीचे लुढ़क रहा था, तब फुटपाथों, झुग्गियों और खुले आसमान के नीचे रहने वाले हजारों गरीब और भूमिहीन लोग ठिठुरते रहे। इसी दौरान समाज कल्याण विभाग के पास मौजूद करीब 30 हजार कंबल जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच सके और अब मौसम बदलने लगा है।
आंकड़े बताते हैं कि समाज कल्याण विभाग के वस्त्र वितरण कार्यक्रम के तहत पिछले साल जिलों को करीब 5 करोड़ रुपये की राशि दी गई थी। इस बजट से 1 लाख 22 हजार 636 कंबल खरीदे गए, जिनमें से 91 हजार 711 कंबल तो बांट दिए गए, लेकिन 30 हजार 925 कंबल अब भी वितरण से बाहर हैं। यानी कुल खरीदे गए कंबलों का करीब 25 प्रतिशत हिस्सा अब तक गरीबों की ठंड दूर नहीं कर पाया। यह स्थिति तब है, जब विभाग की ओर से कंबल बिक्री और वितरण की समय सीमा 15 दिसंबर तय की गई थी।
दिसंबर और जनवरी का महीना बिहार में सबसे सर्द माना जाता है। इस दौरान कंबल सिर्फ राहत सामग्री नहीं, बल्कि जीवन रक्षक साधन बन जाता है। बावजूद इसके, जब ठंड चरम पर थी, तब प्रशासनिक स्तर पर वितरण की रफ्तार सुस्त रही। अब जबकि पारा ऊपर चढ़ने लगा है, सवाल उठ रहा है कि क्या कंबल गरीबों के लिए खरीदे गए थे या सिर्फ कागजों में योजनाओं की खानापूर्ति के लिए।
इस देरी को लेकर राजनीतिक हलकों में भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। सहरसा से विधायक और आईआईपी के अध्यक्ष आईपी गुप्ता ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि जब गरीबों को सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब सरकार आंख मूंदे रही। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सरकार खुद कंबल ओढ़कर सोती रही और गरीब ठंड में कांपते रहे। 30 हजार कंबलों का अब तक न बंटना यह दिखाता है कि गरीबों और भूमिहीनों के प्रति व्यवस्था कितनी असंवेदनशील है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर यही हाल रहा तो जून की गर्मी में कंबल बांटे जाएंगे, जिसका कोई औचित्य नहीं होगा।
यह मामला सिर्फ कंबलों के वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बिहार की सामाजिक कल्याण योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। योजनाएं समय पर जमीन पर न उतरें तो उनका उद्देश्य ही खत्म हो जाता है। ठंड गुजर चुकी है, लेकिन जिन गरीबों को इस दौरान राहत नहीं मिली, उनके लिए यह एक कड़वी सच्चाई बनकर रह गई है।






















