बिहार में वर्षों से लंबित पड़े भूमि विवादों (Bihar Land Dispute) पर अब निर्णायक प्रहार हुआ है। राज्य के उपमुख्यमंत्री सह राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने एक ऐतिहासिक प्रशासनिक निर्णय की घोषणा करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि तीन महीने से अधिक समय तक कोई भी जमीन विवाद बिना ठोस कानूनी कारण के लंबित नहीं रखा जाएगा। यह फैसला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ‘सात निश्चय कार्यक्रम (2025-30)’ के तहत ‘ईज़ ऑफ लिविंग’ के लक्ष्य को धरातल पर उतारने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के प्रधान सचिव सी.के. अनिल द्वारा जारी दिशा-निर्देशों ने ‘लंबित मामले’ की परिभाषा को ही बदल दिया है। अब केवल वही भूमि विवाद लंबित माने जाएंगे, जिन पर सक्षम न्यायालय ने स्पष्ट रूप से सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत स्टे ऑर्डर जारी किया हो। इसका सीधा अर्थ है कि जिन मामलों में किसी प्रकार की कानूनी रोक नहीं है, उन्हें अनावश्यक रूप से फाइलों में दबाकर नहीं रखा जा सकेगा। यह प्रशासनिक सख्ती निचले स्तर पर जवाबदेही तय करने की दिशा में बड़ा बदलाव मानी जा रही है।
अब तक अक्सर देखा जाता था कि भूमि विवादों की सुनवाई तकनीकी कारणों या प्रशासनिक शिथिलता के कारण महीनों और वर्षों तक टलती रहती थी। नई व्यवस्था के तहत संक्षिप्त प्रक्रिया यानी समरी डिस्पोजल के माध्यम से मामलों का त्वरित निपटारा अनिवार्य किया गया है। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना है, ताकि आम नागरिकों को बेवजह चक्कर न लगाने पड़ें।
प्रधान सचिव ने प्रमंडलीय आयुक्तों, जिलाधिकारियों और डीसीएलआर को साप्ताहिक समीक्षा बैठक आयोजित करने का निर्देश दिया है। अधिकतम तीन महीने की समयसीमा तय कर दी गई है, जिससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि सरकार इस बार केवल घोषणा नहीं, बल्कि परिणाम चाहती है। माना जा रहा है कि नियमित मॉनिटरिंग से फील्ड लेवल पर लंबित मामलों की वास्तविक स्थिति सामने आएगी और लापरवाही पर कार्रवाई भी संभव होगी।
उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि भूमि विवाद सामाजिक तनाव और आपसी संघर्ष का बड़ा कारण रहे हैं। गांवों में छोटे-छोटे जमीन के झगड़े कई बार कानून-व्यवस्था की गंभीर समस्या बन जाते हैं। ऐसे में समयबद्ध निष्पादन न केवल न्याय दिलाएगा, बल्कि सामाजिक स्थिरता को भी मजबूत करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह नीति प्रभावी ढंग से लागू हुई, तो बिहार में भूमि प्रबंधन की छवि में बड़ा सुधार देखने को मिल सकता है।






















