Bihar Politics: बिहार की राजनीति में कभी-कभी कुछ तारीखें साधारण कैलेंडर की एंट्री नहीं होतीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाले पड़ाव बन जाती हैं। जनवरी का यह हफ्ता ठीक वैसा ही साबित होता दिख रहा है, जब 20, 23 और 25 जनवरी तीन ऐसे दिन बनकर उभरे हैं, जिन पर सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक की राजनीति की धड़कन टिकी हुई है। इन तीन तारीखों में भाजपा, कांग्रेस और राजद—तीनों की सियासी परीक्षा छिपी है।
20 जनवरी को भारतीय जनता पार्टी ने औपचारिक रूप से नितिन नवीन को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनकर साफ कर दिया कि पार्टी अब युवा नेतृत्व और संगठनात्मक मजबूती के नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। 46 वर्ष की उम्र में देश की सबसे बड़ी पार्टी की कमान संभालना सिर्फ एक नियुक्ति नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सार्वजनिक मंच से नितिन नवीन को “बॉस” कहे जाने को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह भाजपा के भीतर और बाहर दोनों जगह यह संकेत देता है कि अब पार्टी की संगठनात्मक धुरी नितिन नवीन के इर्द-गिर्द घूमेगी। बिहार की मिट्टी से निकला यह नेतृत्व अब राष्ट्रीय राजनीति की धड़कन में शामिल हो चुका है और इसका सीधा असर राज्य की सियासत पर पड़ना तय है।
लेकिन असली हलचल 23 जनवरी को दिखने वाली है। इस दिन कांग्रेस के भीतर मची बेचैनी खुलकर सामने आने वाली है। बिहार में कांग्रेस के छह विधायक लगातार पार्टी गतिविधियों से दूरी बनाए हुए हैं। न वे प्रदेश मुख्यालय की बैठकों में दिख रहे हैं, न ही आंदोलनों में उनकी मौजूदगी नजर आ रही है। नीट छात्रा प्रकरण हो या आयकर विभाग के खिलाफ प्रदर्शन, कांग्रेस के विधायक कहीं दिखाई नहीं दिए। पटना एयरपोर्ट पर बिहार प्रभारी कृष्णा अलवारू के स्वागत की तस्वीरों ने भी सियासी गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए, जहां सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष नजर आए और विधायक गायब रहे।
इसी पृष्ठभूमि में 23 जनवरी को दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान ने बिहार के सभी छह विधायकों को तलब किया है। इस बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, बिहार प्रभारी और प्रदेश नेतृत्व मौजूद रहेगा। सवाल सिर्फ नाराजगी का नहीं है, बल्कि यह भी तय होना है कि कांग्रेस विधानमंडल दल का नेता कौन होगा और पार्टी बिहार में अपनी टूटती पकड़ को कैसे संभालेगी। लगातार यह चर्चा गर्म है कि कांग्रेस के विधायक जदयू, लोजपा रामविलास या किसी अन्य विकल्प की ओर झुक सकते हैं। हालांकि दो विधायक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं, इसलिए भाजपा का विकल्प लगभग बाहर माना जा रहा है, लेकिन जदयू और चिराग पासवान की पार्टी को लेकर अटकलें तेज हैं। 23 जनवरी की बैठक से यह साफ हो जाएगा कि कांग्रेस अपनी बिखरती पंक्तियों को समेट पाएगी या नहीं।
इसके बाद तीसरी और उतनी ही अहम तारीख है 25 जनवरी, जब राष्ट्रीय जनता दल अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक करने जा रहा है। यह बैठक सिर्फ औपचारिक नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे आत्ममंथन के मंच के रूप में देखा जा रहा है। विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद राजद के सामने सबसे बड़ा सवाल नेतृत्व और संगठन की धार को दोबारा तेज करने का है। इसी बैठक में तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा तेज है। हालांकि राजनीतिक जानकार मानते हैं कि तेजस्वी यादव पहले से ही पार्टी की सारी रणनीतिक जिम्मेदारी संभाल रहे थे, ऐसे में यह पद बदलाव से ज्यादा एक सियासी संदेश होगा।
राजद की चुनौती यह है कि वह सड़क से सदन तक अपनी सक्रियता कैसे दिखाए। सोशल मीडिया या बयानों से आगे बढ़कर जमीन पर संघर्ष और जनसरोकारों को उठाना अब अनिवार्य हो चुका है। भाजपा जिस तरह चुनाव के बाद भी बूथ स्तर तक सक्रिय रहती है, वही मॉडल अब विपक्ष के सामने भी एक उदाहरण बन गया है। खासकर तब, जब एनडीए को बिहार में प्रचंड बहुमत मिला हो और अब राष्ट्रीय स्तर पर नितिन नवीन जैसे युवा अध्यक्ष के आने से उसका उत्साह और बढ़ गया हो।
इन तीन तारीखों को जोड़कर देखें तो साफ तस्वीर उभरती है। 20 जनवरी से भाजपा में नितिन युग की शुरुआत हो चुकी है। 23 जनवरी कांग्रेस के लिए अस्तित्व बचाने की कसौटी बनेगी और 25 जनवरी राजद के लिए आत्मविश्लेषण और नए सियासी रास्ते तलाशने का दिन होगा। बिहार की राजनीति फिलहाल एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सत्ता और विपक्ष दोनों को खुद को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। आने वाले हफ्तों में यही तय होगा कि कौन संगठन की मजबूती के दम पर आगे बढ़ता है और कौन आंतरिक कलह में उलझकर पीछे छूट जाता है।






















