Bihar Politics: बिहार की सियासत एक बार फिर तेज करवट लेती दिख रही है। विधानसभा के भीतर और बाहर जिस तरह की राजनीतिक सरगर्मियां चल रही हैं, उसने कांग्रेस के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चर्चाओं के केंद्र में कांग्रेस के सभी छह विधायक हैं, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल होने की तैयारी में हैं। अगर यह सियासी गणित जमीन पर उतरता है तो 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में कांग्रेस का नाम सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएगा।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा अचानक नहीं उभरी है। बीते कुछ हफ्तों से कांग्रेस विधायकों की गतिविधियां और पार्टी कार्यक्रमों से उनकी दूरी इस ओर इशारा कर रही थी कि अंदरखाने कुछ बड़ा पक रहा है। पटना स्थित सदाकत आश्रम में हुए पारंपरिक दही-चूड़ा भोज से सभी छह विधायकों का दूर रहना और फिर प्रदेश अध्यक्ष द्वारा बुलाई गई अहम बैठकों में उनकी गैरहाजिरी ने अटकलों को और हवा दी। जदयू के एक वरिष्ठ नेता का दावा है कि कांग्रेस विधायकों में अपनी पार्टी की कार्यशैली को लेकर गहरी नाराजगी है और उनका मानना है कि जदयू में उन्हें राजनीतिक स्थिरता और सम्मान दोनों मिल सकता है।
सूत्रों के मुताबिक जिन विधायकों के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, उनमें मनोहर प्रसाद सिंह, सुरेंद्र प्रसाद, अभिषेक रंजन, आबिदुर रहमान, मोहम्मद कामरुल होदा और मनोज बिस्वान शामिल हैं। बताया जा रहा है कि ये सभी सीधे तौर पर जदयू नेतृत्व के संपर्क में हैं और फैसला बस औपचारिक ऐलान का इंतजार कर रहा है। इस संभावित दलबदल का असर केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे सत्ता संतुलन को बदल सकता है।
2025 के विधानसभा चुनाव नतीजों में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, जबकि जदयू को 85 सीटें मिली थीं। कांग्रेस के खाते में सिर्फ छह सीटें आई थीं, लेकिन वही छह सीटें अब निर्णायक भूमिका में नजर आ रही हैं। यदि ये विधायक जदयू में शामिल होते हैं तो नीतीश कुमार की पार्टी 91 के आंकड़े पर पहुंच जाएगी और भाजपा को पीछे छोड़ते हुए विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी। यही वजह है कि भाजपा भी इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर रखे हुए है और अपने स्तर पर सियासी जोड़-तोड़ में जुटी है।
भाजपा की निगाहें एनडीए के एक अन्य घटक दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा पर भी टिकी हैं। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी में अंदरूनी असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। चार विधायकों वाली इस पार्टी के तीन विधायक भाजपा के संपर्क में बताए जा रहे हैं। पार्टी प्रमुख द्वारा अपने बेटे को कैबिनेट मंत्री बनाए जाने से असंतोष और गहरा गया है। हाल में इन विधायकों की भाजपा नेताओं से मुलाकात ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में यहां भी बड़ा राजनीतिक टूट-फूट देखने को मिल सकता है।
इसी बीच जदयू की राजनीति में एक और पुराने चेहरे की वापसी की चर्चा ने हलचल बढ़ा दी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और जदयू के कद्दावर नेता रहे आरसीपी सिंह, जो कुछ समय पहले नीतीश कुमार से अलग होकर प्रशांत किशोर के जन सुराज अभियान से जुड़े थे, उनके दोबारा जदयू में लौटने की अटकलें तेज हैं। एक हालिया कुर्मी सम्मेलन में नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह की मौजूदगी को सियासी संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह वापसी होती है तो जदयू की सामाजिक और सांगठनिक ताकत और मजबूत हो सकती है।
कुल मिलाकर बिहार की राजनीति इस वक्त ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां एक फैसला कई दलों की किस्मत बदल सकता है। कांग्रेस के लिए यह सबसे कठिन दौर साबित हो सकता है, जबकि जदयू और भाजपा के बीच सबसे बड़ी पार्टी बनने की होड़ और तेज होने वाली है। आने वाले कुछ दिन बिहार की सियासत की दिशा और दशा दोनों तय कर सकते हैं।






















