Bihar Politics: बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति के बाद मौसम के साथ-साथ सियासी तापमान भी चढ़ने लगा है। दही-चूड़ा भोज की परंपरा ने जहां नेताओं को एक-दूसरे के करीब आने का मौका दिया, वहीं विधानसभा चुनाव के बाद बने हालात ने सत्ता और विपक्ष के बीच फर्क को और साफ कर दिया है। एक तरफ चुनाव जीतकर दसवीं बार मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार हैं, जो सत्ता में लौटते ही फिर से मैदान में उतरने को तैयार दिख रहे हैं, तो दूसरी तरफ हार के बाद नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव हैं, जिनकी खामोशी लगातार सवालों के घेरे में है।
नीतीश कुमार 16 जनवरी से पूरे बिहार में समृद्धि यात्रा शुरू करने जा रहे हैं। यह यात्रा सिर्फ एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेशों से भरी मानी जा रही है। 74 वर्ष की उम्र, स्वास्थ्य को लेकर उठती चर्चाओं और लंबे राजनीतिक सफर के बावजूद नीतीश कुमार की सक्रियता यह दिखाती है कि वे सत्ता को केवल कुर्सी नहीं, बल्कि लगातार जनता के बीच रहकर साधने की रणनीति मानते हैं। विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत के बाद यह उनकी पहली बड़ी राज्यव्यापी पहल है, जिससे यह साफ होता है कि वे सरकार के कामकाज को जमीन पर उतारने और उसका श्रेय लेने दोनों के लिए तैयार हैं।
समृद्धि यात्रा का उद्देश्य सरकार की प्रमुख योजनाओं की समीक्षा और उनके क्रियान्वयन का आकलन बताया जा रहा है। प्रगति यात्रा और सात निश्चय जैसी योजनाओं को आगे बढ़ाने के साथ-साथ मुख्यमंत्री हर जिले में विकास परियोजनाओं का निरीक्षण करेंगे, नई योजनाओं की शुरुआत करेंगे और अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठकें करेंगे। इस दौरान जनता से सीधा संवाद भी होगा, जिससे नीतीश कुमार की उस छवि को और मजबूती मिलेगी, जिसमें वे खुद को जनता से जुड़ा हुआ मुख्यमंत्री बताते रहे हैं।
इसके उलट विपक्ष का चेहरा तेजस्वी यादव इस वक्त सियासी मंच से दूर नजर आ रहे हैं। विधानसभा चुनाव में हार के बाद वे विदेश यात्रा पर गए और लौटने के बाद उन्होंने यह कहा कि वे नीतीश सरकार के कामकाज का सौ दिनों तक अध्ययन करेंगे। राजनीति में यह बयान रणनीतिक धैर्य के तौर पर देखा जा सकता है, लेकिन बिहार की सियासत में लगातार मौजूदगी को ताकत माना जाता है। ऐसे में तेजस्वी की यह चुप्पी उनके समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच बेचैनी पैदा कर रही है।
दही-चूड़ा भोज के दौरान यह फर्क और ज्यादा उभरकर सामने आया। जहां तेज प्रताप यादव ने अपने आवास पर भोज का आयोजन कर सुर्खियां बटोरीं और लालू प्रसाद यादव की मौजूदगी से एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश हुई, वहीं तेजस्वी यादव का इसमें शामिल न होना एक बार फिर लालू परिवार की अंदरूनी दूरी की चर्चा को हवा दे गया। चुनाव के बाद भी परिवार और पार्टी में एकजुटता का स्पष्ट संकेत न मिलना राजद के लिए चुनौती बनता दिख रहा है।
नीतीश कुमार की यात्राओं का इतिहास बताता है कि वे इसे सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद से उन्होंने न्याय यात्रा से लेकर समाधान और प्रगति यात्रा तक कई यात्राएं निकाली हैं। हर यात्रा का एक राजनीतिक संदर्भ रहा है और हर बार इसका असर चुनावी और संगठनात्मक स्तर पर देखने को मिला है। समृद्धि यात्रा भी उसी कड़ी का हिस्सा मानी जा रही है, जिसमें वे जदयू संगठन को पंचायत स्तर तक मजबूत करने और एक करोड़ सदस्य बनाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
पहले चरण में नौ जिलों की यात्रा से नीतीश कुमार पश्चिम चंपारण के बेतिया से शुरुआत करेंगे और पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, शिवहर, गोपालगंज, सीवान, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली तक जाएंगे। यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से बेहद अहम माने जाते हैं और यहां की नब्ज पकड़ना आने वाले चुनावी मुकाबलों के लिहाज से जरूरी है। हर जिले में अधिकारियों के साथ समीक्षा और जनता से संवाद नीतीश कुमार की उस शैली को दोहराएगा, जिसने उन्हें लंबे समय तक बिहार की राजनीति का केंद्र बनाए रखा है।
इस सक्रियता के बीच विपक्ष की स्थिति सवालों में है। राजद के साथ-साथ कांग्रेस की भी चुनौतियां कम नहीं हैं। कांग्रेस के छह विधायकों को लेकर चल रही चर्चाओं और दही-चूड़ा भोज से उनकी दूरी ने महागठबंधन की मजबूती पर सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष के भीतर तालमेल और नेतृत्व की स्पष्टता का अभाव नीतीश कुमार के लिए राजनीतिक बढ़त का मौका बन सकता है।






















