बिहार की राजनीति में एक बार फिर राज्य के खजाने और सरकारी खर्च (Bihar Budget) को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। राष्ट्रीय जनता दल ने मौजूदा राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सत्ता में बैठे लोग सुनियोजित तरीके से बिहार के खजाने को खाली करने में जुटे हैं। राजद प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में पार्टी के मुख्य प्रदेश प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने सरकार की आर्थिक नीतियों और फैसलों को कटघरे में खड़ा किया और खर्चों पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग को जनता के सवाल से जोड़ दिया।
शक्ति सिंह यादव का कहना था कि जिस तरह से सरकार बेतहाशा खर्च कर रही है, उसने बिहार को कर्ज के दलदल में धकेल दिया है। उन्होंने दावा किया कि आज राज्य पर तीन लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज हो चुका है और इसका बोझ सीधे तौर पर आम लोगों पर पड़ रहा है। उनके मुताबिक, बिहार का हर नागरिक औसतन करीब पच्चीस हजार रुपये के कर्ज का भार झेल रहा है। राजद नेता ने इसे सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा मुद्दा बताया।
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उन्होंने चुनावी वादों की भी याद दिलाई और कहा कि सत्ता हासिल करने के लिए महिलाओं को दस हजार रुपये देकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की गई, लेकिन चुनाव के दौरान किए गए बड़े-बड़े वादों पर अब सरकार चुप्पी साधे हुए है। शक्ति सिंह यादव ने कहा कि महिलाओं के खातों में दो लाख रुपये देने के वादे की हकीकत यह है कि अगर इसे लागू किया जाए तो सिर्फ इसी योजना से करीब दो लाख सत्तर हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। इसके अलावा वेतन मद में एक लाख पांच हजार करोड़ रुपये की जरूरत होगी। कुल मिलाकर यह रकम तीन लाख पैंतालीस हजार करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है, जबकि पूरे बिहार का सालाना बजट ही करीब तीन लाख करोड़ रुपये के आसपास है। राजद ने सवाल उठाया कि जब गणित ही मेल नहीं खा रहा, तो सरकार जनता को भ्रम में क्यों रख रही है।
राजद ने खर्चों की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए और कहा कि सरकार को राज्य के खजाने से हो रहे हर खर्च का श्वेत पत्र जारी करना चाहिए। पार्टी का तर्क है कि आम लोगों के बीच यह चर्चा आम हो चुकी है कि आखिर बिहार को बार-बार तोड़कर फिर से बनाने की सोच क्यों पनप रही है और विकास के बजाय प्रतीकों और इमारतों पर अरबों रुपये क्यों खर्च किए जा रहे हैं।
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बिहार निवास को तोड़कर नए सिरे से बनाने के फैसले ने इस बहस को और तेज कर दिया है। शक्ति सिंह यादव ने कहा कि बिहार निवास महज 32 साल पुरानी और मजबूत इमारत है, फिर उसे गिराने की क्या मजबूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके पीछे विकास नहीं, बल्कि राजनीतिक ईर्ष्या काम कर रही है। उनका कहना था कि वहां लगे लालू प्रसाद यादव के नाम के शिलापट्ट से सत्तारूढ़ दल को आपत्ति है और इसी वजह से एक ठीक-ठाक इमारत को गिराने की योजना बनाई जा रही है। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि बिहार भवन करीब 90 साल पुराना है, जबकि नया बना बिहार सदन देखने में माचिस की डिब्बी जैसा लगता है, फिर भी पुराने और उपयोगी ढांचे को बचाने के बजाय नया निर्माण प्राथमिकता बन गया है।
राजद नेता ने यह सवाल भी उठाया कि सरकार शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय नाम मिटाने और नाम जोड़ने की राजनीति में क्यों उलझी हुई है। उनका कहना था कि अगर सरकार सच में बिहार का भविष्य बदलना चाहती है तो राज्य को एजुकेशन हब बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए, न कि सिर्फ इमारतें तोड़ने और बनाने में जनता का पैसा बहाए। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के करीबी चाहते हैं कि उनका नाम शिलापट्ट पर दर्ज हो, इसलिए बिहार निवास को गिराने का फैसला लिया जा रहा है।
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शक्ति सिंह यादव ने साफ कहा कि राष्ट्रीय जनता दल इस मुद्दे को सड़क से सदन तक ले जाएगा और राज्य के खजाने की रक्षा के लिए संघर्ष करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी खजाना किसी एक दल या व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि बिहार की जनता की गाढ़ी कमाई है, जिसे बचाना सभी की जिम्मेदारी है।
प्रेस वार्ता के अंत में प्रदेश प्रवक्ता एजाज अहमद ने भी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि राजद इस मुद्दे पर लगातार सरकार को घेरेगा और जनता के हितों की रक्षा के लिए हर स्तर पर लड़ाई जारी रखेगा। उनका कहना था कि आने वाले दिनों में यह सवाल और तेज होगा कि आखिर बिहार के पैसे का हिसाब कौन देगा।






















