Surendra Yadav: गयाजी और आसपास की सियासत में अगर दबदबे, बाहुबल और बेबाक जुबान का कोई चेहरा सबसे पहले याद आता है, तो वह नाम है जहानाबाद के सांसद सुरेंद्र यादव का। राष्ट्रीय जनता दल में लालू प्रसाद यादव के सबसे करीबी नेताओं में गिने जाने वाले सुरेंद्र यादव को तेजस्वी यादव की अनौपचारिक ‘किचन कैबिनेट’ का भी अहम सदस्य माना जाता है। तीन दशक तक बेलागंज विधानसभा सीट पर कब्जा जमाए रखने वाले सुरेंद्र यादव ने चुनावी राजनीति में जो निरंतरता दिखाई, वह कम नेताओं के हिस्से आई। हालांकि, यह निरंतरता विकास कार्यों से ज्यादा विवादों, आरोपों और आक्रामक सार्वजनिक व्यवहार से जुड़ी रही।
ताजा विवाद ने एक बार फिर उनके राजनीतिक व्यक्तित्व के उसी सख्त और असहज चेहरे को सामने ला दिया है, जिससे आरजेडी अक्सर असहज होती रही है। गया जिले के अतरी विधानसभा क्षेत्र में आयोजित एक स्थानीय क्रिकेट टूर्नामेंट के दौरान सुरेंद्र यादव बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे थे। कार्यक्रम के बाद जब ग्रामीणों ने सड़क, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल उठाए, तो सांसद का संयम जवाब दे गया। कैमरे के सामने ही उन्होंने स्थानीय लोगों को अपशब्द कहे, जिसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस घटना ने न सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति में हलचल मचा दी, बल्कि पार्टी की छवि पर भी नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस गुस्से की जड़ें केवल तात्कालिक नाराजगी तक सीमित नहीं थीं। अतरी सीट पर हालिया विधानसभा चुनाव में आरजेडी की हार ने पुराने सियासी समीकरणों को पूरी तरह उलट दिया। तीन पीढ़ियों से यादव परिवार के प्रभाव में रही यह सीट पहली बार हाथ से फिसल गई। हम पार्टी के टिकट पर रोमित कुमार की जीत ने उस राजनीतिक किले को ढहा दिया, जिसे वर्षों से अभेद्य माना जाता था। हार का यह झटका इतना गहरा था कि उसका गुस्सा कथित तौर पर अपने ही समर्थकों पर फूट पड़ा। स्थानीय लोगों का मानना है कि यही असंतोष और भीतर की खीझ सार्वजनिक गाली-गलौज का कारण बनी।
सुरेंद्र यादव का नाम पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर तब गूंजा था, जब संसद की गरिमा से जुड़ा एक अभूतपूर्व विवाद सामने आया। वर्ष 1998 में लोकसभा के भीतर उन्होंने तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी के हाथ से महिला आरक्षण बिल की प्रति छीन ली और उसे फाड़कर सदन में फेंक दिया। यह दृश्य देशभर में प्रसारित हुआ और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर बहस छिड़ गई। आलोचकों ने इसे संसदीय परंपराओं का खुला अपमान बताया, जबकि समर्थकों ने इसे राजनीतिक विरोध की उग्र अभिव्यक्ति करार दिया। इस एक घटना ने सुरेंद्र यादव को विवादों की स्थायी सूची में शामिल कर दिया।
राजनीतिक ताकत के साथ-साथ उनके नाम से जुड़ा आपराधिक रिकॉर्ड भी लंबे समय से चर्चा में रहा है। पुलिस फाइलों और चुनावी हलफनामों के अनुसार, उन पर तीन दर्जन से अधिक आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं। 1991 में गया कलेक्ट्रेट के सामने कांग्रेस नेता जय कुमार पालित के साथ मारपीट का आरोप भी उन्हीं मामलों में शामिल है। इसके बावजूद चुनावी राजनीति में उनका कद बना रहा, जो बिहार की जमीनी राजनीति की जटिलताओं को भी उजागर करता है।
संपत्ति के लिहाज से भी सुरेंद्र यादव बिहार के संपन्न नेताओं में गिने जाते हैं। चुनाव आयोग को दिए हलफनामे में उनकी कुल संपत्ति करीब 13 करोड़ रुपये बताई गई है। इसमें करोड़ों की जमीन, लाखों रुपये का सोना, कई वाहन और नकद राशि शामिल है।






















