बिहार में घोषित पांच राज्यसभा (Bihar Rajya Sabha) सीटों के चुनाव ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। 243 सदस्यीय विधानसभा के अंकगणित ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है, जहां विपक्षी महागठबंधन 35 विधायकों के साथ एक सीट पर दावा ठोकने की तैयारी में है, जबकि सत्तारूढ़ एनडीए 202 विधायकों के बूते सभी पांच सीटों पर कब्जे का खाका खींच चुका है। असली उत्सुकता इस बात को लेकर है कि क्या ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और बहुजन समाज पार्टी का समर्थन विपक्ष के लिए निर्णायक साबित होगा या एनडीए अपने अतिरिक्त वोटों का प्रबंधन कर विपक्ष की रणनीति को निष्प्रभावी कर देगा।
राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और इंडियन इंक्लूसिव पार्टी शामिल हैं। महागठबंधन के पास 35 विधायक हैं, जो एक सीट के लिए आवश्यक न्यूनतम आंकड़े से छह कम हैं। AIMIM के पांच और BSP के एक विधायक के समर्थन से यह कमी पूरी हो सकती है। यही वजह है कि विपक्ष ‘विस्तृत सामाजिक प्रतिनिधित्व’ के तर्क के साथ इन दलों से सहयोग की उम्मीद जता रहा है।
राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने प्रतिस्पर्धा को लोकतंत्र की अनिवार्यता बताते हुए कहा कि पांच में से कम से कम एक सीट पर चुनाव लड़ना जरूरी है। कांग्रेस के कमरुल होदा और माकपा के अजय कुमार ने भी संकेत दिए कि मुसलमानों और दलितों के मुद्दों पर साझा राजनीतिक रुख को देखते हुए सहयोग की अपेक्षा स्वाभाविक है। हालांकि AIMIM की ओर से यह संदेश भी आया है कि समर्थन एकतरफा अपेक्षा नहीं होना चाहिए और अन्य दल भी उनके उम्मीदवार पर विचार कर सकते हैं। यह बयान साफ करता है कि सौदेबाजी और राजनीतिक संकेतों का दौर अभी जारी रहेगा।
दूसरी ओर सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने सभी पांच सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा कर दी है। सूत्रों के अनुसार जनता दल (यूनाइटेड) अपनी दो सीटें बनाए रखने की तैयारी में है, भारतीय जनता पार्टी दो सीटों पर दावेदारी कर सकती है और पांचवीं सीट लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के खाते में जाने की संभावना है। जद(यू) नेता अशोक चौधरी ने अतिरिक्त मतों की व्यवस्था का दावा कर यह संकेत दिया है कि एनडीए विपक्ष की संभावित गोलबंदी से बेपरवाह है।
इस चुनाव का बड़ा आयाम सामाजिक समीकरण भी है। विपक्ष AIMIM और BSP के जरिए मुस्लिम-दलित प्रतिनिधित्व की एक संयुक्त राजनीतिक कथा गढ़ना चाहता है, जबकि एनडीए अपने व्यापक विधायकीय बहुमत और ‘स्थिरता’ के तर्क को आगे रख रहा है। अगर विपक्ष को AIMIM-BSP का ठोस समर्थन मिलता है तो एक सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय समीकरण में बदल सकता है, लेकिन क्रॉस-वोटिंग, अनुपस्थित मतदान या रणनीतिक वोट मैनेजमेंट जैसे कारक भी अंतिम नतीजे को प्रभावित कर सकते हैं।






















