बिहार में राज्यसभा (Bihar Rajya Sabha Election) की पांच सीटों के लिए होने वाले चुनाव ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। देशभर में 37 सीटों पर हो रहे चुनाव में बिहार की भूमिका खास मानी जा रही है, क्योंकि यहां सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए अंकगणित के साथ-साथ राजनीतिक संदेश भी दांव पर है। एनडीए के तीन और महागठबंधन के दो सांसदों का कार्यकाल पूरा हो रहा है, ऐसे में नई रणनीति और सीट बंटवारे का फॉर्मूला तय करना दोनों खेमों के लिए चुनौती बन गया है।
सत्ता पक्ष में सहयोगी दलों के बीच अंदरूनी मंथन तेज है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने गठबंधन नेतृत्व को पुराने आश्वासन की याद दिलाते हुए कहा कि उन्हें दो लोकसभा और एक राज्यसभा सीट देने की बात हुई थी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई औपचारिक दावा पेश नहीं किया, लेकिन यह संकेत जरूर दिया कि वे अंतिम निर्णय तक प्रतीक्षा करेंगे और उन्हें भरोसा है कि नेतृत्व वादे से पीछे नहीं हटेगा। मांझी का यह बयान ऐसे समय आया है जब एनडीए के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर कई दावेदार सक्रिय हैं।
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इस बीच एलजेपी (आरवी) के प्रमुख चिराग पासवान ने अपनी मां रीना पासवान को राज्यसभा भेजे जाने की अटकलों को खारिज कर दिया। इससे साफ है कि सहयोगी दल सार्वजनिक रूप से संयम बरत रहे हैं, लेकिन अंदरखाने समीकरण साधने की कोशिशें जारी हैं। जिन नेताओं का कार्यकाल समाप्त हो रहा है उनमें रामनाथ ठाकुर, हरिवंश नारायण सिंह, उपेंद्र कुशवाहा, प्रेमचंद्र गुप्ता और अमरेंद्रधारी सिंह जैसे नाम शामिल हैं, जिससे चुनाव का महत्व और बढ़ गया है।
विधानसभा की मौजूदा संख्या एनडीए को बढ़त देती है। 243 सदस्यीय सदन में एनडीए के पास 202 विधायक हैं। एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए 41 वोट की जरूरत होती है। गणित के लिहाज से पांचों सीटें जीतने के लिए 205 विधायकों का समर्थन चाहिए, यानी सत्ता पक्ष को अतिरिक्त समर्थन की आवश्यकता पड़ सकती है। यही कारण है कि सहयोगी दलों को साधने की कवायद तेज है और भाजपा-जदयू के बीच संभावित 2-2 सीटों के फॉर्मूले पर चर्चा की खबरें हैं, जबकि एक सीट सहयोगी दल को देने का विकल्प भी टेबल पर बताया जा रहा है।






















