बिहार में 11 फरवरी से जारी राजस्व कर्मचारियों (Bihar Revenue Employee) की अनिश्चितकालीन हड़ताल अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। राज्य के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के मंत्री विजय कुमार सिन्हा के साथ हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद सरकार और कर्मचारी संघ दोनों की ओर से नरमी के संकेत मिले हैं। यदि सब कुछ तय योजना के अनुसार हुआ तो आने वाले दिनों में राज्यभर के अंचल कार्यालयों में कामकाज सामान्य हो सकता है।
सरकार ने साफ संदेश दिया है कि 31 मार्च तक “परिमार्जन” का लक्ष्य हर हाल में पूरा किया जाए। मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि कामकाज ठप कर दबाव बनाने से समाधान नहीं निकलता, बल्कि संवाद और विश्वास से ही रास्ता बनता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब दाखिल-खारिज, जाति, आय, निवास प्रमाणपत्र, परिमार्जन प्लस और ई-मापी जैसी सेवाएं ठप होने से आम जनता को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही है।
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आठ महीने पुराने आश्वासन पर अटका विवाद
हड़ताली कर्मचारियों का तर्क है कि लगभग आठ महीने पहले मुख्य सचिव और विभागीय प्रधान सचिव के साथ हुई वार्ता में उनकी मांगों पर लिखित आश्वासन दिया गया था, लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ। यही असंतोष अब आंदोलन का रूप ले चुका है। सरकार की ओर से संकेत दिया गया है कि पुराने आश्वासनों की समीक्षा होगी और जो मांगें न्यायसंगत होंगी, उन पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।
यहां राजनीतिक संदेश भी साफ है। सरकार चाहती है कि पहले राजस्व सेवाएं पटरी पर लौटें, ताकि जनता की नाराजगी कम हो और प्रशासनिक व्यवस्था सुचारु बने। उसके बाद चरणबद्ध तरीके से मांगों पर निर्णय लिया जाए। 31 मार्च की समयसीमा इसलिए भी अहम है क्योंकि वित्तीय वर्ष के अंत में राजस्व और भूमि संबंधी लंबित मामलों का निपटारा सरकार की प्राथमिकता में होता है।
कर्मचारियों की प्रमुख मांगें क्या हैं
बिहार राज्य भूमि सुधार कर्मचारी संघ संयुक्त संघर्ष मोर्चा की मांगों में ग्रेड पे 1900 से बढ़ाकर 2800 करना, नवनियुक्त कर्मियों को गृह जिले में पदस्थापन, लंबित सेवा संपुष्टि, एसीपी-एमएसीपी का लाभ, रिक्त पदों पर वरीयता के आधार पर पदोन्नति, कार्य के लिए लैपटॉप और इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाएं, अतिरिक्त कार्य का अतिरिक्त भुगतान, मुफ्त चिकित्सा सुविधा, पुरानी पेंशन योजना की बहाली और प्रस्तावित राजस्व कर्मचारी नियमावली 2025 को निरस्त करना शामिल है।
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इन मांगों का वित्तीय प्रभाव भी बड़ा है। यदि ग्रेड पे और पुरानी पेंशन योजना जैसे मुद्दों पर सहमति बनती है तो राज्य सरकार पर अतिरिक्त व्यय का दबाव बढ़ेगा। ऐसे में सरकार फिलहाल चरणबद्ध और प्रदर्शन-आधारित समाधान की रणनीति अपनाती दिख रही है।
जनता पर असर और प्रशासनिक चुनौती
हड़ताल का सबसे अधिक असर ग्रामीण इलाकों में देखा जा रहा है, जहां जमीन संबंधी कार्यों के लिए लोग अंचल कार्यालयों पर निर्भर रहते हैं। दाखिल-खारिज में देरी से भूमि विवाद बढ़ने की आशंका है, वहीं प्रमाणपत्रों के लंबित रहने से छात्रों और जरूरतमंद परिवारों को योजनाओं का लाभ लेने में बाधा आ रही है। खाली पड़े कार्यालय प्रशासनिक संकट का प्रतीक बन गए हैं।






















