नीतीश कुमार के नेतृत्व में अप्रैल 2016 में लागू की गई बिहार की पूर्ण शराबबंदी (Bihar Sharabbandi Law) एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में है। भाई वीरेंद्र ने विधानसभा के बजट सत्र के 15वें दिन सरकार के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच बड़े अंतर का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जिस सामाजिक सुधार के नाम पर यह कानून लागू हुआ था, उसके परिणाम अब सवालों के घेरे में हैं।
जब 2016 में पूर्ण शराबबंदी की घोषणा हुई थी, तब इसे घरेलू हिंसा, अपराध और सामाजिक कुरीतियों पर निर्णायक प्रहार बताया गया था। सरकार ने दावा किया था कि शराबबंदी से परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और समाज में सकारात्मक बदलाव आएगा। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि अब तस्वीर बदल चुकी है और कानून का असर कागजों तक सिमटता जा रहा है।
भाई वीरेंद्र ने सदन में कहा कि राज्य का शायद ही कोई गांव या कस्बा ऐसा बचा हो, जहां अवैध शराब की उपलब्धता न हो। उनका आरोप है कि कई इलाकों में शराब की ‘होम डिलीवरी’ तक की जा रही है, जिससे कानून की साख पर सवाल खड़े हो रहे हैं। उनका कहना है कि प्रतिबंध के बावजूद अवैध तस्करी और गुप्त बिक्री का नेटवर्क सक्रिय है, जो प्रशासनिक तंत्र की चुनौती को उजागर करता है।
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वहीं शराबबंदी की समीक्षा की मांग को लेकर घिरे रालोमा विधायक माधव आनंद ने कहा कि शराबबंदी कानून जनहित से जुड़ा हुआ मामला। शराबबंदी कानून जनहित से जुड़ा हुआ मामला। जनहित से जुड़े हुए मामले को अगर कोई भी विधायक उठाते हैं तो उसको राजनीति से जोड़ने की आवश्यकता नहीं है। मैंने मांग कर दी तो क्या हम एनडीए से बाहर चले जाएं, ऐसा थोड़ी होता है।
जनहित से जुड़ा हुआ मामला है। मैंने तो गंभीरता से अपनी ही सरकार से मांग किया है। बिहार के लोकप्रिय मुख्यमंत्री जी पर हम लोग को पूरा भरोसा है। हमेशा से जैसे समीक्षा करते आ रहे हैं, चाहे कोई भी कानून हो, उसकी समीक्षा की मैंने बात की। अब उसको राजनीतिक रंग देना कि हम सरकार के विरोध में है, सरकार के फेवर में है, ये गलत है। अगर कोई कानून बना है तो उस कानून की समीक्षा तो होनी ही चाहिए ना।
अब कौन विधायक क्या कहते हैं, उनका जवाब देने के लिए मैं यहां नहीं खड़ा हूं, लेकिन मैं अपने पार्टी के तरफ से विधायक दल होने के नाते मैं आप लोगों के माध्यम से मांग करता हूं कि इसकी समीक्षा होनी चाहिए।






















