बिहार में 2016 से लागू शराबबंदी कानून (Bihar Sharabbandi Law) एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। लगभग एक दशक बाद इस कानून की समीक्षा की मांग ने सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी शुरू कर दी है। मंगलवार को विधानसभा में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधायक माधव आनंद द्वारा शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग उठाते ही राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई। यह मुद्दा अब सिर्फ कानून की प्रभावशीलता तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि गठबंधन राजनीति और राज्य की सामाजिक नीति पर नए सवाल खड़े कर रहा है।
बिहार में शराबबंदी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रमुख सामाजिक पहल मानी जाती रही है, जिसे महिलाओं और सामाजिक संगठनों का व्यापक समर्थन मिला था। लेकिन समय के साथ इसके क्रियान्वयन और परिणामों पर सवाल उठते रहे हैं। अब सत्ता पक्ष के ही सहयोगी दल के विधायक द्वारा समीक्षा की बात उठाने से यह संकेत मिल रहा है कि गठबंधन के भीतर भी नीति को लेकर मतभेद उभर रहे हैं या कम से कम व्यावहारिक चुनौतियों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
NEET Student Death Case: फिर जहानाबाद पहुंची CBI टीम.. भाई का मोबाइल जब्त, परिजनों से लंबी पूछताछ
जेडीयू ने इस पूरे विवाद पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी भी कानून की समय-समय पर समीक्षा होती है, लेकिन समीक्षा का मतलब कानून को कमजोर करना या समाप्त करना नहीं है। पार्टी के प्रवक्ता अभिषेक झा ने अप्रत्यक्ष रूप से सहयोगी विधायक पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर समीक्षा की आड़ में शराबबंदी में ढील देने की कोशिश की जाती है तो यह स्वीकार्य नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में राज्य सरकार शराबबंदी कानून को सख्ती से लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है और आगे भी यह नीति जारी रहेगी।
इस मुद्दे पर विपक्षी दलों ने सरकार को घेरने का मौका नहीं छोड़ा। एआईएमआईएम विधायक अख्तरुल ईमान ने शराबबंदी कानून को पूरी तरह विफल बताते हुए दावा किया कि राज्य में शराब की अवैध आपूर्ति जारी है और माफिया सक्रिय हैं। उनका कहना है कि प्रतिबंध के बावजूद शराब की उपलब्धता और कथित होम डिलीवरी इस नीति की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शराबबंदी के कारण युवा वर्ग में अन्य प्रकार के नशे का चलन बढ़ रहा है, जो एक नई सामाजिक चुनौती बन रही है।
‘कठपुतली मुख्यमंत्री’ से ‘विधायक खरीद’ तक… तेजस्वी-नीतीश की तीखी टकराहट ने गरमाया बिहार का बजट सत्र
सरकार की ओर से वरिष्ठ मंत्री विजय चौधरी ने इस आलोचना का जवाब देते हुए कहा कि शराबबंदी कानून सर्वदलीय सहमति से लागू किया गया था और यह बिहार की सामाजिक प्रतिबद्धता का हिस्सा है। उनके अनुसार यह कानून पहले भी लागू था, अभी भी लागू है और भविष्य में भी लागू रहेगा। सरकार इसे सामाजिक सुधार और कानून व्यवस्था से जुड़ी नीति के रूप में देखती है, न कि सिर्फ राजनीतिक निर्णय के तौर पर।
आरजेडी ने इस विवाद को लेकर मुख्यमंत्री से सीधे जवाब की मांग की है। पार्टी के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि जब सत्ताधारी गठबंधन के विधायक ही समीक्षा की मांग उठा रहे हैं तो यह साफ संकेत है कि जमीनी स्तर पर नीति को लेकर समस्याएं हैं। उन्होंने जहरीली शराब से होने वाली मौतों और अवैध कारोबार का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सरकार को वास्तविक स्थिति पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।






















