RJD नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव (Tejashwi vs BJP) ने हालिया बयान में मौजूदा सरकार के पहले 100 दिन पर मौन रहने का संकेत दिया, लेकिन साथ ही चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संरचना पर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए। तेजस्वी का कहना है कि “पिछले चुनाव में लोकतंत्र में ‘लोक’ हारा है और तंत्र जीता है,” यानी चुनाव के नतीजों को लेकर उन्होंने EVM, धनबल और सत्ता-तंत्र के प्रभाव पर सीधा निशाना साधा है।
तेजस्वी ने कहा कि भाजपा-नीत नई सरकार ने जिस तरह से सत्ता हासिल की है, उसे जनता समझ रही है लेकिन वे 100 दिन तक मौजूदा सरकार को बिना आलोचना के देखेंगे। उनका दावा है कि इन 100 दिनों में सरकार को माताओं-बहनों के लिए वादे पूरे करने होंगे और 1 करोड़ युवाओं को नौकरियां देने पर जवाब देना होगा। यानी तेजस्वी फिलहाल विपक्षी रणनीति में “साइलेंट ऑब्ज़र्वर मोड” में हैं।
100 दिन चुप रहेंगे तेजस्वी यादव.. चिराग पासवान का तंज- कुछ होगा तब न बोलेंगे
हालांकि तेजस्वी की इस “विराम रणनीति” पर बीजेपी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। बिहार भाजपा अध्यक्ष संजय सरावगी ने दावा किया कि जनता तेजस्वी को नकार चुकी है और विधानसभा में गंभीर मुद्दों पर बहस के दौरान उनकी गैर-हाज़िरी इसका प्रमाण है। सरावगी का आरोप है कि तेजस्वी नेता प्रतिपक्ष रहते हुए भी जनता के मुद्दों को लेकर गंभीर नहीं रहे, इसलिए अब उनका मौन कोई राजनीतिक संदेश नहीं बल्कि जिम्मेदारी से बचने जैसा है।
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह की प्रतिक्रिया इससे भी कठोर रही। उन्होंने कहा कि दोनों बाप-बेटे मौन हो जाएं और 100 दिन प्रायश्चित करें, जो तेजस्वी और लालू यादव पर सीधी चुटकी थी। इससे स्पष्ट है कि भाजपा तेजस्वी के मौन को विपक्ष की रणनीति नहीं, बल्कि राजनीतिक मजबूरी के रूप में पेश करना चाहती है।






















