बिहार की राजनीति (Bihar Politics News) में एक बार फिर भाषा, कानून और रोजगार जैसे मुद्दों ने जोर पकड़ लिया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के विधायक अख्तरुल ईमान ने राज्य सरकार पर उर्दू भाषा की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनके बयान ने न सिर्फ भाषा नीति बल्कि शराबबंदी कानून और राज्य की रोजगार व्यवस्था पर भी नई राजनीतिक चर्चा शुरू कर दी है।
अख्तरुल ईमान का कहना है कि उर्दू बिहार की दूसरी राजभाषा होने के बावजूद सरकारी स्तर पर उसे पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि लंबे समय से उर्दू शिक्षकों की बहाली नहीं होने के कारण मदरसों और शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की भारी कमी हो गई है। उनका आरोप है कि यह स्थिति भाषा के विकास और संरक्षण दोनों के लिए खतरा बनती जा रही है। उन्होंने सरकार से तत्काल भर्ती प्रक्रिया शुरू करने और उर्दू भाषा को बढ़ावा देने के लिए ठोस नीति बनाने की मांग की।
शराबबंदी कानून पर बोलते हुए अख्तरुल ईमान ने संतुलित रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी के विचारों के अनुरूप शराबबंदी एक ऐतिहासिक फैसला था और इस कदम को सकारात्मक रूप में देखा जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जमीनी स्तर पर कानून का प्रभाव कमजोर दिखाई देता है। उनके अनुसार अवैध शराब का कारोबार अब भी जारी है और इस पर नियंत्रण के लिए प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है। उन्होंने सरकार से शराबबंदी कानून की प्रभावशीलता का व्यापक मूल्यांकन करने की मांग की।
राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो शराबबंदी बिहार की राजनीति का संवेदनशील विषय रहा है। एक ओर सरकार इसे सामाजिक सुधार का मॉडल बताती है, वहीं विपक्ष लगातार इसके क्रियान्वयन पर सवाल उठाता रहा है। ऐसे में AIMIM विधायक का यह बयान एक नए राजनीतिक संतुलन को दर्शाता है, जहां नीति का समर्थन और उसके क्रियान्वयन की आलोचना दोनों साथ-साथ दिखाई दे रही है।
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रोजगार के मुद्दे पर भी अख्तरुल ईमान ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि राज्य में बड़े प्रोजेक्ट्स में बाहरी इंजीनियरों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि स्थानीय युवा बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। उनका दावा है कि इसका सबसे अधिक असर दलित और पिछड़े वर्गों पर पड़ रहा है, जिनके पास सीमित संसाधन हैं और जो सरकारी अवसरों पर निर्भर रहते हैं। इस बयान को सामाजिक न्याय की राजनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है, जो बिहार की राजनीतिक धारा का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
राज्यसभा सीट को लेकर उन्होंने संकेत दिया कि AIMIM समर्थन देने के लिए तैयार है, लेकिन इसके लिए उन दलों को वंचित वर्गों की आवाज को प्राथमिकता देनी होगी जो समर्थन चाहते हैं। उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी का जिक्र करते हुए कहा कि जो नेता दबे-कुचले समाज के अधिकारों के लिए मजबूती से खड़े होते हैं, उन्हें राजनीतिक सहयोग मिलना चाहिए।






















