Bakast Land Controversy: बिहार विधान परिषद की कार्यवाही शुरू होते ही बकाश्त भूमि का मुद्दा अचानक राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का केंद्र बन गया। जेडीयू के विधान पार्षद नीरज कुमार ने सदन के भीतर अपनी ही सरकार से ऐसे सवाल पूछ दिए, जिनसे राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग को सफाई देने की स्थिति में आना पड़ा। बकाश्त भूमि के रैयतीकरण को लेकर उठे सवालों ने न केवल जमीन से जुड़े पुराने कानूनों की व्याख्या पर नई बहस छेड़ दी, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में संभावित विरोधाभास की ओर भी संकेत किया।
सदन में नीरज कुमार ने कहा कि बकाश्त भूमि की समस्या पूरे बिहार में जटिल और अस्पष्ट बनी हुई है, जिससे आम लोग और जमीन से जुड़े हितधारक परेशान हैं। उन्होंने सरकार के 2014 के संकल्प और पुराने कानूनी प्रावधानों के बीच तालमेल को लेकर सवाल उठाया। उनका कहना था कि यदि खतियान में बकास दर्ज है, किसी अन्य व्यक्ति की जमाबंदी चल रही है और लगान की रसीद पहले से कट रही है, तो फिर ऐसी जमीन का रैयतीकरण किस आधार पर किया जा रहा है। उन्होंने विशेष रूप से बिहार भूमि सुधार अधिनियम 1950 की धारा 5 के तहत पूर्व मध्यवर्तियों और जमींदारों से जुड़े नियमों का हवाला देते हुए स्पष्टता की मांग की।
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राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने सदन में जवाब देते हुए कहा कि अधिनियम की धारा 5, 6 और 7 के तहत यदि नियमानुसार लगान निर्धारित होकर राजस्व रसीद जारी हो रही है, तभी बकाश्त भूमि को रैयती भूमि माना जा सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बिहार भूमि सुधार अधिनियम 2010 केवल ग्रामीण क्षेत्र की रैयती भूमि पर लागू होता है, इसलिए जब तक बकाश्त भूमि को विधिवत रैयती का दर्जा नहीं मिलता, तब तक भूमि समपरिवर्तन नियमानुकूल नहीं माना जा सकता।
हालांकि नीरज कुमार ने मंत्री के जवाब पर फिर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि पहले से लगान की रसीद कट रही है, तो फिर रैयतीकरण की प्रक्रिया का औचित्य क्या है। इस पर मंत्री ने स्वीकार किया कि बकाश्त भूमि का मामला संवेदनशील और जटिल है, इसलिए विभाग ने एक कमेटी गठित कर दी है, जो सभी पहलुओं का अध्ययन कर निर्णय लेगी। उन्होंने कहा कि बिना व्यापक जांच के जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
दरअसल, बकाश्त भूमि का मुद्दा बिहार में लंबे समय से विवाद और कानूनी उलझनों से जुड़ा रहा है। जमींदारी उन्मूलन से पहले जमींदार अपने निजी उपयोग या खेती के लिए कुछ जमीन अपने पास रखते थे, जिसे बकाश्त भूमि कहा जाता था। बाद में जमींदारी व्यवस्था खत्म होने के बाद कई जगहों पर इन जमीनों का स्वामित्व वास्तविक खेती करने वालों या सरकार को सौंपा गया, लेकिन पुराने रिकॉर्ड, कब्जे और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अंतर के कारण आज भी कई जिलों में विवाद सामने आते रहते हैं।






















