बिहार विधान परिषद (Bihar Vidhan Parishad) के बजट सत्र में युवाओं और बच्चों में बढ़ती नशाखोरी का मुद्दा केंद्र में रहा। चर्चा के दौरान सरकार की ओर से पहली बार यह स्वीकार किया गया कि शराबबंदी के बावजूद सूखे नशे का चलन एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनकर उभरा है। सदन में उठी आवाजों ने यह संकेत दिया कि समस्या केवल कानून-व्यवस्था की नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार और सीमा-पार आपूर्ति श्रृंखला से भी जुड़ी है। इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने नशाखोरी को जड़ से खत्म करने के लिए मिशन मोड में काम करने का संकेत दिया, जिसमें जागरूकता, शिक्षा संस्थानों की भागीदारी और सामुदायिक हस्तक्षेप को साथ लेकर चलने की योजना है।
जेडीयू एमएलसी रवींद्र प्रसाद सिंह ने बहस की शुरुआत करते हुए कहा कि युवाओं के बीच सूखा नशा तेजी से फैल रहा है और आयोगों के गठन से आगे बढ़कर उन्हें जमीनी स्तर पर अधिक सक्रिय करने की जरूरत है। उनका तर्क था कि अभियान तब तक असरदार नहीं होंगे, जब तक गांव-टोले और स्कूल-कॉलेजों तक नियमित संवाद और जनजागरूकता नहीं पहुंचे। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि राज्यव्यापी अभियान को निरंतरता के साथ चलाया जाए ताकि नशे के प्रति सामाजिक अस्वीकार्यता मजबूत हो।
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सरकार की ओर से मंत्री अशोक चौधरी ने सदन में खड़े होकर माना कि बच्चों में सूखे नशे की प्रवृत्ति चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि शराबबंदी और पूर्ण नशाबंदी सरकार की प्राथमिकताओं में है और इस दिशा में केंद्र सरकार व एजेंसियों के साथ मिलकर लगातार कार्रवाई हो रही है। उनके मुताबिक बैनर-पोस्टर, सोशल मीडिया और मैराथन जैसे जनआंदोलनों के जरिए संदेश पहुंचाया जा रहा है, लेकिन आने वाले समय में प्रयासों को और संस्थागत रूप दिया जाएगा। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लेक्चर सीरीज, साथ ही नशे से उबर चुके चर्चित चेहरों की भागीदारी से युवाओं को प्रेरित करने की योजना पर विचार किया जा रहा है ताकि संदेश केवल डर पर नहीं, बल्कि सकारात्मक उदाहरणों पर टिके।


















