बिहार विधानसभा में खाद और यूरिया की कालाबाजारी (Bihar Urea Black Marketing) का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। किसानों की परेशानी को लेकर उठे सवालों ने न केवल विपक्ष बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर भी असहजता पैदा कर दी है। नरकटिया से विधायक विशाल कुमार ने सदन में आरोप लगाया कि खाद की कालाबाजारी केवल बाजार की समस्या नहीं बल्कि पदाधिकारियों और डीलरों की कथित मिलीभगत का नतीजा है, इसलिए मामले की निष्पक्ष जांच के लिए संबंधित लोगों की मोबाइल लोकेशन की जांच कराई जानी चाहिए। उनके बयान ने विधानसभा की कार्यवाही में नई बहस को जन्म दे दिया और कृषि व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
विधायक ने कहा कि खेतों में किसानों को समय पर खाद नहीं मिल रही, जबकि खुले बाजार में ऊंचे दाम पर यूरिया आसानी से उपलब्ध है। यह स्थिति कृषि तंत्र में सप्लाई और निगरानी के बीच बड़े अंतर की ओर संकेत करती है। उन्होंने दावा किया कि कई किसान बोआई और फसल प्रबंधन के महत्वपूर्ण चरण में खाद के अभाव से जूझ रहे हैं, जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है। उनका कहना था कि जब सरकारी आंकड़े पर्याप्त आपूर्ति की बात करते हैं, तब जमीन पर कमी कैसे बनी हुई है, यह प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा सवाल है।
कृषि मंत्री रामकृपाल यादव ने सदन में सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि वर्ष 2025-26 के खरीफ और रबी दोनों सीजन के लिए जरूरत से ज्यादा यूरिया उपलब्ध कराया गया है। मंत्री के अनुसार, खाद की कमी की शिकायतों के बावजूद राज्य में आपूर्ति पर्याप्त है और कालाबाजारी रोकने के लिए लगातार कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने बताया कि पूर्वी चंपारण में 12 लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया है और 19 डीलरों के लाइसेंस रद्द किए गए हैं। पूरे बिहार में अब तक 419 लाइसेंस रद्द किए जा चुके हैं और 104 लोगों पर एफआईआर दर्ज की गई है, जो सरकार की सख्त नीति को दर्शाता है।
हालांकि मंत्री के जवाब के बाद भी सदन का माहौल शांत नहीं हुआ। बीजेपी विधायक नीरज बब्लू ने आरोप लगाया कि बिहार का यूरिया पड़ोसी देश नेपाल तक तस्करी होकर पहुंच रहा है, जिससे स्थानीय किसानों के लिए उपलब्धता प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि अगर तस्करी की आशंकाएं सही हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि संगठित नेटवर्क की ओर इशारा करता है और सरकार को निगरानी तंत्र मजबूत करना होगा।






















