बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने जिस आक्रामक रणनीति के साथ मोर्चा खोला है, उसने प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा दिया है। बीते वर्षों की तुलना में इस साल निगरानी ब्यूरो की कार्रवाई न केवल तेज हुई है, बल्कि इसके नतीजे भी पहले से कहीं अधिक सख्त और प्रभावी नजर आ रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में अब तक भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई छह गुना तक बढ़ चुकी है, जबकि 29 दोषी अधिकारियों को अदालत से सजा भी सुनाई जा चुकी है। यह संकेत है कि राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ केवल छापेमारी नहीं, बल्कि कानूनी अंजाम तक पहुंचाने की रणनीति पर काम हो रहा है।
हाल ही में पथ निर्माण विभाग से जुड़ा एक बड़ा रिश्वत कांड सामने आया, जिसने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए। विभाग के सहायक अभियंता और उनके लेखपाल पर 40 लाख रुपये के टेंडर को पास कराने के एवज में रिश्वत मांगने का आरोप लगा। वादी की शिकायत के आधार पर निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने जाल बिछाया और पहली किस्त के रूप में 14 लाख रुपये लेते हुए दोनों अभियुक्तों को रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। यह कार्रवाई न सिर्फ एक सफल ट्रैप ऑपरेशन रही, बल्कि यह भी साबित करती है कि अब शिकायत करने वालों की बातों को गंभीरता से लिया जा रहा है।
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निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के महानिदेशक जितेंद्र सिंह गंगवार ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ यह अभियान रुकने वाला नहीं है। उनके अनुसार, हाल ही में लोक अभियोजकों के साथ एक अहम बैठक की गई, जिसमें जीरो टॉलरेंस नीति को सख्ती से लागू करने पर सहमति बनी। इस बैठक में यह भी तय किया गया कि मामलों की मजबूत पैरवी की जाए ताकि दोषी किसी भी सूरत में कानूनी शिकंजे से बच न सकें।
आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ष अब तक निगरानी ब्यूरो ने ट्रैप के जरिए करीब 113 मामले दर्ज किए हैं और 98 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है। यह संख्या अपने आप में इस बात का संकेत है कि राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई अब केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि निरंतर और परिणामोन्मुखी हो चुकी है। प्रशासनिक गलियारों में यह संदेश साफ तौर पर जा चुका है कि रिश्वतखोरी और अनियमितताओं पर अब कोई नरमी नहीं बरती जाएगी।





















